उत्तराखंड के कोटद्वार में हाल ही में “बाबा” शब्द को लेकर उपजा विवाद एक बार फिर सांप्रदायिक संवेदनशीलता और भाषाई साझेदारी के मुद्दे को सामने ला रहा है। जनवरी 2026 के अंत में, गणतंत्र दिवस के आसपास शुरू हुए इस विवाद ने पूरे क्षेत्र में तनाव पैदा कर दिया, जब बाजरंग दल जैसे तथाकथित हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने एक 70 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद की दुकान “बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर” के नाम पर आपत्ति जताई। उन्होंने दावा किया कि “बाबा” शब्द स्थानीय सिद्धबली बाबा मंदिर (हनुमान जी का प्रसिद्ध मंदिर) से जुड़ा हुआ है, और एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा इसका इस्तेमाल धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। दुकानदार, जो पिछले 30 वर्षों से यह दुकान चला रहे हैं, ने नाम बदलने से इनकार कर दिया, जिससे प्रदर्शन और भीड़ का जमावड़ा हुआ।

इस घटना ने न केवल स्थानीय स्तर पर पुलिस को फ्लैग मार्च कराने पर मजबूर किया, बल्कि राष्ट्रीय ध्यान भी आकर्षित किया। एक स्थानीय जिम ट्रेनर दीपक कुमार, जो हिंदू हैं, ने दुकानदार का साथ दिया और भीड़ से भिड़ते हुए कहा, “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है,” जो एकता और सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक बन गया। इस बयान के बाद दीपक को धमकियां मिलीं, और 31 जनवरी को देहरादून व ऋषिकेश से सैकड़ों कार्यकर्ता कोटद्वार पहुंचे, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई। विडंबना यह है कि उत्तराखंड पुलिस ने दीपक पर सौहार्द बिगाड़ने के आरोप में FIR दर्ज किया है। अब कोई सरकार के इशारे पर नाचने वालों को कौन समझाए कि दीपक सौहार्द बिगाग नहीं बल्कि बना रहा था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दीपक को “भारत का हीरो” बताते हुए उनका समर्थन किया, और बीजेपी तथा संघ परिवार पर नफरत फैलाने का आरोप लगाया।
यह विवाद “बाबा” शब्द की उत्पत्ति और उसके सार्वभौमिक स्वभाव को नए संदर्भ में जांचने का अवसर देता है। मूल रूप से, “बाबा” एक ऐसा शब्द है जो दुनिया की कई भाषाओं में पाया जाता है, और इसका इतिहास काफी दिलचस्प है। जैसा कि एक विस्तृत विश्लेषण में बताया गया है, हिंदी और उर्दू में प्रयोग होने वाले इस शब्द का मुख्य स्रोत फारसी और तुर्की भाषाएं हैं। आधुनिक भूगोल के अनुसार, इसकी जड़ें मुख्य रूप से ईरान (प्राचीन फारस) और मध्य एशिया (तुर्की क्षेत्र) में हैं, जहां इसका अर्थ “पिता” या “दादा” होता है। भाषाविज्ञान के अनुसार, यह एक ध्वन्यात्मक (ओनोमेटोपोइक) शब्द है, जो छोटे बच्चों द्वारा आसानी से उच्चारित की जाने वाली शुरुआती ध्वनियों से निकला है, जैसे “पा-पा” या “मा-मा”। यही वजह है कि यह शब्द रूस में “बाबुष्का” (दादी) के रूप में, अफ्रीका की कई भाषाओं में “पिता” या “बड़ा” के अर्थ में, और अन्य संस्कृतियों में भी अलग-अलग रूपों में मौजूद है।
भारत में “बाबा” का आगमन मध्यकालीन इतिहास से जुड़ा है। सूफी संतों और मुगल शासकों के माध्यम से फारसी प्रभाव के साथ यह शब्द यहां पहुंचा, और बुजुर्गों या आध्यात्मिक गुरुओं के सम्मान के लिए इस्तेमाल होने लगा, जैसे बाबा फरीद या बाबा बुल्ले शाह। स्थानीय भाषाओं में पहले से मौजूद “बाप” या “बप्पा” जैसे शब्दों के साथ यह आसानी से घुल-मिल गया। कोटद्वार विवाद में यह दिलचस्प है कि “बाबा” को विशुद्ध रूप से हिंदू धार्मिक संदर्भ से जोड़ा जा रहा है, जबकि इसका मूल फारसी है और यह साझा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। मुस्लिम संतों के लिए भी “बाबा” का प्रयोग आम है, जो दर्शाता है कि यह शब्द सांप्रदायिक सीमाओं से परे है। फिर भी, स्थानीय संदर्भ में सिद्धबली बाबा मंदिर की वजह से यह धार्मिक भावनाओं से जुड़ गया, जो भाषाई इतिहास की अनदेखी करता प्रतीत होता है।
इस विवाद का विश्लेषण करते हुए हम देखते हैं कि “बाबा” की सार्वभौमिकता ही इसकी ताकत है, लेकिन स्थानीय व्याख्याएं इसे विवादास्पद बना सकती हैं। ईरान और मध्य एशिया से निकला यह शब्द भारत में सद्भाव का प्रतीक बन सकता है, बजाय विभाजन का। कोटद्वार की घटना हमें याद दिलाती है कि भाषा और शब्दों की जड़ें साझा हैं, और इन्हें सांप्रदायिक चश्मे से देखना समाज को कमजोर करता है। अंत में, दीपक कुमार जैसे व्यक्तियों की बहादुरी से साबित होता है कि इंसानियत और संविधान की रक्षा में शब्दों की उत्पत्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण है एक-दूसरे का सम्मान।
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