बिहार चुनाव 2025 संकट में? जन सुराज ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती, ‘वोट के बदले नोट’ और जीविका दीदियों की भूमिका पर सवाल



नई दिल्ली/पटना | जन आक्रोश

बिहार की राजनीति में एक नया भूचाल आ गया है। प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली जन सुराज पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव, 2025 की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पार्टी ने न केवल चुनावी प्रक्रिया को चुनौती दी है, बल्कि राज्य में दोबारा चुनाव कराने की मांग भी की है।
शुक्रवार को भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच इस हाई-प्रोफाइल मामले (W.P.(C) No. 107/2026) की सुनवाई करेगी।



क्या है पूरा मामला?
जन सुराज पार्टी द्वारा आर्टिकल 32 के तहत दायर रिट याचिका में आरोप लगाया गया है कि बिहार चुनाव के दौरान सत्ताधारी दल ने सरकारी मशीनरी और धनबल का अवैध उपयोग किया है। याचिका में मुख्य रूप से दो बड़े मुद्दों को आधार बनाया गया है:

AI IMAGE
  • 1. आचार संहिता के बीच 10,000 रुपये का ट्रांसफर: याचिकाकर्ता का आरोप है कि चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू होने के बावजूद, ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत लगभग 25 से 35 लाख महिला वोटरों के खातों में सीधे 10,000 रुपये ट्रांसफर किए गए। जन सुराज का तर्क है कि यह संविधान के आर्टिकल 14 (समानता) और आर्टिकल 324 (निष्पक्ष चुनाव) का उल्लंघन है। इसे कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के तहत “भ्रष्ट आचरण” (Corrupt Practice) और मतदाताओं को लुभाने के लिए रिश्वत माना जाना चाहिए।
  • 2. पोलिंग बूथ पर ‘जीविका दीदियों’ की तैनाती: याचिका में 1.8 लाख ‘जीविका’ (सेल्फ-हेल्प ग्रुप) कार्यकर्ताओं को पोलिंग बूथों पर तैनात करने को भी अवैध बताया गया है। आरोप है कि सरकारी लाभ पाने वाली इन कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल वोटरों को प्रभावित करने के लिए किया गया, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत के खिलाफ है।सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की गई है?

सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की गई है?
जन सुराज ने कोर्ट से ऐतिहासिक हस्तक्षेप की मांग की है:

  • बिहार विधानसभा चुनाव, 2025 के परिणामों को रद्द कर नए सिरे से चुनाव कराए जाएं।
  • चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि वह चुनाव की तारीखों की घोषणा से कम से कम 6 महीने पहले किसी भी नई ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ (DBT) या मुफ्त योजना की घोषणा पर रोक लगाए।
  • एस. सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु राज्य (2013) के फैसले के तहत मुफ्त योजनाओं (Freebies) पर सख्त दिशानिर्देश तैयार किए जाएं।

कानूनी विशेषज्ञों की राय: क्या टिक पाएगा यह केस?

कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह मामला संवैधानिक और तकनीकी पेंच के बीच फंसा है।

  • चुनौती: संविधान का अनुच्छेद 329(b) कहता है कि चुनाव संपन्न होने के बाद नतीजों को केवल हाई कोर्ट में ‘चुनाव याचिका’ के जरिए चुनौती दी जा सकती है, सीधे सुप्रीम कोर्ट में रिट के जरिए नहीं। इस आधार पर चुनाव रद्द करने की मांग कमजोर पड़ सकती है।
  • मजबूत पक्ष: हालांकि, अगर कोर्ट यह मानता है कि आचार संहिता के दौरान नकद पैसा बांटना “लोकतंत्र के मूल ढांचे” (Basic Structure) पर हमला है, तो वह चुनाव आयोग को भविष्य के लिए कड़े नियम बनाने का निर्देश दे सकता है।

जन आक्रोश का विश्लेषण:
यह याचिका सिर्फ एक हार-जीत का मामला नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में “लेवल प्लेइंग फील्ड” को बचाने की लड़ाई है। अगर चुनाव से ठीक पहले सरकारी खजाने से पैसा बांटकर वोट खरीदे जाएंगे, तो निष्पक्ष चुनाव का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई यह तय करेगी कि क्या चुनाव आयोग की शक्तियों की समीक्षा का समय आ गया है?

आपकी राय इस मामले में क्या है? नीचे दिए Social Media icon पर क्लिक कर Comment करें या connect@janaakrosh.com पर email करें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *