डेहरी | जन आक्रोश मीडिया विशेष
डेहरी-ऑन-सोन (रोहतास): डेहरी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अहरांव गांव में पिछले कुछ समय से एक अजीबोगरीब और खौफनाक सिलसिला चल रहा है। गांव के अलग-अलग घरों में अचानक से धुआं उठने और बिना किसी स्पष्ट कारण के आग लगने की घटनाओं ने ग्रामीणों को दहशत में डाल दिया है। दिन हो या रात, अचानक भड़कने वाली इन लपटों को ग्रामीण खौफ के साए में ‘तंत्र-मंत्र’ या किसी ‘अदृश्य शक्ति’ का प्रकोप मान रहे हैं। लेकिन क्या वाकई इसके पीछे कोई भूत-प्रेत है, या फिर यह विज्ञान और किसी की सोची-समझी साजिश का नतीजा है? आइए, इस पूरी घटना का हर पहलू से विश्लेषण करते हैं।

दहशत के साए में अहरांव गांव
लगातार हो रही इन घटनाओं के बाद गांव में डर का माहौल है। लोग अपने ही घरों में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। हालांकि, मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने गांव का दौरा किया है और ग्रामीणों से किसी भी तरह के अंधविश्वास में न पड़ने की अपील की है। प्रशासन अब वहां सीसीटीवी कैमरे लगाने और मजिस्ट्रेट की तैनाती करने की तैयारी कर रहा है।
क्या यह दुनिया की पहली घटना है? बिल्कुल नहीं!
अहरांव की घटना कोई इकलौता मामला नहीं है। दुनिया भर में और भारत के कई राज्यों में ऐसी ‘रहस्यमयी’ आग की घटनाएं पहले भी सामने आ चुकी हैं:
- राष्ट्रीय स्तर पर: उत्तर प्रदेश के कासगंज, राजस्थान के चूरू और बिहार के ही अररिया जिले (झुआ गांव) में ऐसे ही मामले सामने आए थे, जहां घरों में रखे कपड़ों और बिस्तरों में अपने आप आग लग जाती थी।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर: इटली के कानेतो दी कारोनिआ (Canneto di Caronia) गांव में 2004 से 2015 के बीच ऐसी ही घटनाएं हुईं। लोगों ने एलियंस से लेकर शैतानी ताकतों तक को जिम्मेदार ठहराया। लेकिन अंततः जांच में खुलासा हुआ कि एक स्थानीय व्यक्ति ही आपदा राहत कोष का पैसा ऐंठने के लिए चुपचाप आग लगा रहा था।
इन घटनाओं के पीछे छिपे वैज्ञानिक कारण
जब विज्ञान की कसौटी पर ऐसी घटनाओं को परखा जाता है, तो इसके पीछे अक्सर निम्नलिखित कारण सामने आते हैं:
- मानवीय शरारत (Attention Seeking): 90% से अधिक मामलों में यह घर या गांव के ही किसी सदस्य (अक्सर बच्चे, किशोर या मानसिक तनाव से ग्रस्त व्यक्ति) की हरकत होती है, जो ध्यान खींचने या आपसी रंजिश के चलते छुपकर आग लगाता है।
- मीथेन या फॉस्फीन गैस: गांवों में पुरानी नालियों, दलदल या जैविक कचरे के सड़ने से ज्वलनशील गैसें बनती हैं। फॉस्फीन गैस तो हवा के संपर्क में आते ही स्वतः जल उठती है (Spontaneous ignition)।
- रासायनिक दहन: अगर घर में अलसी के तेल या भारी तेल से भीगे कपड़े सिकुड़ कर रखे हों, तो उनमें अंदर ही अंदर गर्मी पैदा होती है और वे भड़क उठते हैं। इसके अलावा सोडियम या सफेद फास्फोरस जैसे रसायनों का इस्तेमाल भी आग लगाने के लिए किया जा सकता है।
- ऑप्टिकल मैग्निफिकेशन: पानी से भरी प्लास्टिक की बोतल या कांच के बर्तन पर सूरज की किरणें पड़ने से वे ‘मैग्निफाइंग ग्लास’ का काम करते हैं, जिससे रुई या कपड़े सुलग सकते हैं।
सच्चाई जानने के लिए बहुआयामी जांच की जरूरत
अहरांव गांव को इस खौफ से निकालने के लिए प्रशासन को केवल एक दिशा में नहीं, बल्कि कई दृष्टिकोणों से जांच करनी होगी:
- फोरेंसिक जांच: जले हुए कपड़ों और राख के सैंपल की एफएसएल (FSL) जांच हो, ताकि किसी ज्वलनशील रसायन की पुष्टि हो सके।
- मनोवैज्ञानिक जांच: गांव में संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जाए और यह देखा जाए कि घटना के वक्त कोई खास व्यक्ति बार-बार वहां मौजूद तो नहीं रहता।
- प्रशासनिक सख्ती: सीसीटीवी कैमरों की मदद से गुप्त निगरानी की जाए और अफवाह फैलाने वाले तांत्रिकों/ओझाओं पर सख्त कार्रवाई हो।
- भौगोलिक और तकनीकी जांच: बिजली विभाग द्वारा शॉर्ट सर्किट की जांच हो और भूवैज्ञानिकों द्वारा जमीन के नीचे गैस रिसाव की संभावना तलाशी जाए।
निष्कर्ष: अहरांव गांव में लग रही आग कोई चमत्कार या दैवीय प्रकोप नहीं है। इसके पीछे या तो कोई वैज्ञानिक कारण है या फिर किसी इंसान की शरारत। ग्रामीणों को धैर्य और संयम बनाए रखते हुए प्रशासन की जांच में सहयोग करना चाहिए, ताकि इस रहस्य पर से जल्द से जल्द पर्दा उठ सके।
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