जानिए कैसे ईरान के हमलों से सहमे अरब देश अब ‘पेट्रो-डॉलर’ व्यवस्था को खत्म कर अमेरिका को सबसे बड़ा झटका देने की तैयारी में हैं।
कहावत है कि “सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे का?” खाड़ी के तेल उत्पादक देशों (गल्फ कंट्रीज) ने भी दशकों तक यही सोचकर चैन की नींद ली थी। अपनी ज़मीन के नीचे दबे बेशकीमती ‘ब्लैक गोल्ड’ यानी कच्चे तेल (पेट्रो-केमिकल) का व्यापार उन्होंने सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी डॉलर में करना कबूल किया था। शर्त बस एक थी— दुनिया के सबसे बड़े ‘कोतवाल’ यानी अमेरिका को उनकी सुरक्षा की गारंटी देनी होगी।

लेकिन आज जब ईरान से मिसाइलों और ड्रोन्स की बारिश हो रही है और इन खाड़ी देशों को सुरक्षा की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, तो उन्हें दिख रहा है कि उनका ‘सैंया’ तो कहीं और ही मेहरबान है। अमेरिका का पूरा ध्यान और सैन्य ताकत खाड़ी देशों को बचाने में नहीं, बल्कि ‘सौतन’ यानी इज़राइल की सुरक्षा और उसके दुश्मनों पर पलटवार (retaliate) करने में लगी हुई है। ईरान से अपनी ऐसी “पिटाई” होते देख अब खाड़ी देशों के गलियारों में दबे पाँव अमेरिका से ‘तलाक’ की खबरें गूंजने लगी हैं।
आखिर क्या है यह ‘पेट्रो-डॉलर’ व्यवस्था? (आसान भाषा में)
पेट्रो-डॉलर कोई खास तरह का डॉलर या कोई केमिकल नहीं है। जब दुनिया भर में बिकने वाला पेट्रोलियम (कच्चा तेल) सिर्फ अमेरिकी डॉलर में खरीदा और बेचा जाता है, तो उस डॉलर को ‘पेट्रो-डॉलर’ कहा जाता है।
1974 में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक ऐतिहासिक डील हुई थी। अमेरिका ने कहा, “तुम अपना तेल सिर्फ डॉलर में बेचो और जो अथाह पैसा (डॉलर) आए, उसे वापस हमारे ही अमेरिकी बैंकों और बॉन्ड्स में निवेश कर दो। बदले में हमारी सेना तुम्हारे तेल के कुओं, बंदरगाहों और राजघरानों की पूरी रक्षा करेगी।” इसी को कूटनीति की भाषा में ‘ऑयल फॉर सिक्योरिटी’ (सुरक्षा के बदले तेल) समझौता कहा गया।
इसी व्यवस्था ने अमेरिका को दुनिया का ‘सुपरपावर’ बना दिया, क्योंकि पूरी दुनिया को तेल चाहिए था, और तेल के लिए डॉलर।
अब क्यों आ रही है ‘तलाक’ की नौबत?
ईरान बहुत स्मार्ट खिलाड़ी है। वह जानता है कि अमेरिका से सीधे युद्ध करने में नुकसान है। इसलिए ईरान ने उस ‘नस’ को दबाया है जो अमेरिका और खाड़ी देशों के रिश्ते की बुनियाद है।
हाल के दिनों में सऊदी अरब के तेल ठिकानों, कतर के गैस कॉम्प्लेक्स और ओमान के बंदरगाहों पर जो हमले हुए हैं, वे महज इत्तेफाक नहीं हैं। ईरान खाड़ी देशों को यह समझा रहा है कि जिस ‘कोतवाल’ के भरोसे तुम उछल रहे हो, वह तुम्हारी ऊर्जा संरचना को नहीं बचा सकता।
‘सौतन’ पर मेहरबान ‘सैंया’
जब खाड़ी देशों के तेल टैंकरों और बंदरगाहों पर हमले हो रहे हैं, तब अमेरिका का पूरा जंगी बेड़ा इज़राइल की तरफ ढाल बनकर खड़ा है। इज़राइल की हिफाज़त के लिए अमेरिका ईरान पर जवाबी कार्रवाई करने को तैयार बैठा है, लेकिन जब बात अरब देशों के तेल रिफाइनरियों की आती है, तो वाशिंगटन में सन्नाटा छा जाता है।
इसी बात ने गल्फ देशों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जिस सुरक्षा के वादे पर उन्होंने अपना 2 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 166 लाख करोड़ रुपये) अमेरिका में निवेश कर रखा है, वह वादा तो खोखला निकल गया!
क्या होगा अगर हुआ ‘जियोपॉलिटिकल डिवोर्स’?
अगर खाड़ी देश सच में अमेरिका से यह ‘तलाक’ ले लेते हैं, तो इसके अंजाम बहुत भयानक होंगे:
- डॉलर का दबदबा खत्म: अगर खाड़ी देश अपना 2 ट्रिलियन डॉलर का निवेश अमेरिकी बाज़ार से निकाल लें, तो अमेरिका की अर्थव्यवस्था औंधे मुँह गिर पड़ेगी।
- ‘पेट्रो-युआन’ की एंट्री: चीन आज खाड़ी देशों का सबसे बड़ा ग्राहक है। अगर तेल का व्यापार डॉलर की जगह चीन की मुद्रा ‘युआन’ में होने लगा, तो अमेरिकी डॉलर को रद्दी के भाव आते देर नहीं लगेगी।
- अमेरिकी साम्राज्य का पतन: यह सिर्फ एक आर्थिक बदलाव नहीं होगा, बल्कि उस अमेरिकी साम्राज्य के ढहने की शुरुआत होगी, जो दशकों से डॉलर की ताकत पर टिका था।
कुल मिलाकर, खाड़ी देशों को यह बात समझ आने लगी है कि ‘कोतवाल’ अब बूढ़ा हो चुका है और उसकी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। ऐसे में अपना घर बचाने के लिए अमेरिका की उंगली छोड़कर किसी और (जैसे चीन) का हाथ पकड़ना ही उन्हें समझदारी लग रहा है।
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