विशेष रिपोर्ट: जन आक्रोश
नई दिल्ली/वाशिंगटन: मध्य पूर्व (Middle East) की राजनीति हमेशा से ही रहस्यों और साजिशों का केंद्र रही है, लेकिन हाल ही में ईरान पर हुए विनाशकारी हमले ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई सहित कई शीर्ष अधिकारियों की मौत हो गई। दुनिया भर की नजरें अमेरिका और इजरायल पर टिकी थीं, लेकिन ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की एक सनसनीखेज रिपोर्ट ने इस पूरी कहानी के असली ‘विलेन’ को बेनकाब कर दिया है।

रिपोर्ट के खुलासे के अनुसार, इस खूनी खेल का मास्टरमाइंड वाशिंगटन या तेल अवीव में नहीं, बल्कि रियाद में बैठा था। जी हां, सऊदी अरब का क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने पर्दे के पीछे से डोनाल्ड ट्रंप पर हमले के लिए भारी दबाव बनाया था।
दुनिया की आंखों में धूल: MBS का ‘शांति’ का नाटक
सार्वजनिक तौर पर सऊदी अरब खुद को शांतिदूत के रूप में पेश कर रहा था। MBS दुनिया को यह दिखा रहा था कि वे ईरान के साथ युद्ध नहीं, बल्कि कूटनीतिक समाधान चाहता हैं। हालात यहां तक थे कि जब बातचीत चल रही थी, तब क्राउन प्रिंस ने खुद ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन को फोन किया और भरोसा दिलाया कि सऊदी अरब अपने एयर स्पेस (हवाई क्षेत्र) या जमीन का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए कभी नहीं होने देगा।
लेकिन, वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट बताती है कि यह सिर्फ दुनिया की आंखों में धूल झोंकने का एक पैंतरा था।
ट्रंप को ‘सीक्रेट कॉल्स’ और खुफिया रिपोर्ट की अनदेखी
पर्दे के पीछे की हकीकत बेहद चौंकाने वाली है। सूत्रों के मुताबिक:
- निजी लॉबिंग: पिछले एक महीने में मोहम्मद बिन सलमान ने डोनाल्ड ट्रंप को कई सीक्रेट प्राइवेट कॉल्स किए और ईरान पर सैन्य हमले की जोरदार वकालत की।
- चेतावनी: MBS और उसके भाई (सऊदी रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान) ने अमेरिकी अधिकारियों को खुली चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ने ‘अभी’ हमला नहीं किया, तो ईरान भविष्य में और अधिक खतरनाक हो जाएगा।
- खुफिया एजेंसियों को किया दरकिनार: सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि अमेरिका की अपनी खुफिया जांच में यह सामने आया था कि अगले एक दशक तक ईरान की सेना अमेरिका के लिए कोई सीधा खतरा नहीं है। इसके बावजूद, इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू और सऊदी अरब के दबाव में आकर ट्रंप ने हमले का ‘ग्रीन सिग्नल’ दे दिया।
शांति वार्ता के बीच रची गई मौत की साजिश
यह हमला उस वक्त करवाया गया जब कूटनीति अपने चरम पर थी। अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम को लेकर बातचीत चल रही थी। ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ और उनके दामाद जेरेड कुशनर ईरानी नेताओं के साथ शांति वार्ता की मेज पर थे। इसी कूटनीतिक धुंध का फायदा उठाकर सऊदी अरब ने अपना एजेंडा सेट किया और ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म करवा दिया।
मध्य पूर्व का ‘नया शीत युद्ध’
जानकारों का मानना है कि इस साजिश की जड़ें दशकों पुरानी शिया-सुन्नी दुश्मनी और मध्य पूर्व में वर्चस्व की जंग में छिपी हैं। सऊदी अरब (सुन्नी बहुल) और ईरान (शिया बहुल) दशकों से यमन और सीरिया जैसे देशों में ‘प्रॉक्सी वॉर’ (परोक्ष युद्ध) लड़ रहे हैं।
इस बार सऊदी अरब ने सीधे तौर पर अपने हाथ गंदे नहीं किए, बल्कि अपनी कूटनीतिक चाल से अमेरिका और इजरायल के कंधे पर बंदूक रखकर अपने सबसे बड़े क्षेत्रीय दुश्मन को तबाह कर दिया। ईरान पर हुए जवाबी हमलों की निंदा करने में भी सऊदी सबसे आगे रहा, जो उसके ‘डबल गेम’ को साफ दर्शाता है।
निष्कर्ष: दुनिया भर के विश्लेषक अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या मध्य पूर्व में शांति कभी संभव है? जब शांति की बात करने वाले ही युद्ध की पटकथा लिख रहे हों, तो असली विलेन पहचानना मुश्किल हो जाता है। इस घटना ने मध्य पूर्व के इस ‘शीत युद्ध’ को एक बेहद खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा किया है, जिसके परिणाम आने वाले कई दशकों तक महसूस किए जाएंगे। जहां एक तरफ आम लोग शिया और सुन्नी का भेद भूल एक उम्मत के नाम पर एक जुट होने को तैयार हैं वहीं अपने आप को मुसलमानों का रहबर कहने वाला सऊदी अरब का शाही खानदान इस बात को क्यों नहीं मान रहा यह समझ के परे हैं।
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