बक्सर/पटना/वाराणसी | जन आक्रोश
बक्सर के सांसद माननीय सुधाकर सिंह जी ने एक अत्यंत भावुक और ‘सुंदर’ पत्र लिखा है। भाषा इतनी क्लिष्ट और वेदनापूर्ण है कि पढ़कर किसी का भी दिल पसीज जाए। उन्होंने मुख्यमंत्री जी से पूछा है कि BHU ट्रॉमा सेंटर में बिहार के मरीजों का इलाज क्यों रोका गया? 8 करोड़ का भुगतान क्यों नहीं हुआ? लेकिन, इस चिट्ठी को पढ़ते हुए एक अजीब सी कसक रह गई। ऐसा लगा मानो सांसद महोदय के लेटर-पैड पर जगह थोड़ी कम पड़ गई थी। शायद स्याही खत्म हो गई होगी, या फिर पन्ने का निचला हिस्सा आ गया होगा। वरना, यह कैसे संभव है कि इतना जागरूक जनप्रतिनिधि यह लिखना भूल जाए कि—”मानवर! बिहार के लोग आखिर इलाज कराने दूसरे राज्य (UP) जा ही क्यों रहे हैं?” उन्होंने यह तो लिखा कि ‘अपमानजनक स्थिति’ है, लेकिन उस पत्र में यह मांग नदारद थी कि— “अगर माननीय स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय जी से बिहार की व्यवस्था नहीं संभल रही, तो उन्हें हटाकर किसी ऐसे व्यक्ति को कुर्सी दी जाए जो काम करना जानता हो।”


क्या बिहार की नियति केवल पड़ोसी राज्यों के अस्पतालों के बिल भरना है? या हम कभी अपना अस्पताल भी बनाएंगे?
आंकड़े झूठ नहीं बोलते: बिहार की बदहाल तस्वीर
सांसद जी का पत्र तो एक बानगी भर है। असलियत तो वे सरकारी और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स बता रही हैं, जिन्हें हमारी सरकारें रद्दी की टोकरी में डाल देती हैं। आइए, जरा उस ‘विकास’ का पोस्टमार्टम करें जिसका ढिंढोरा पीटा जाता है:
- नीति आयोग का ‘हेल्थ इंडेक्स’ (2021): नीति आयोग चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में 19 बड़े राज्यों में बिहार सबसे निचले पायदान (Bottom) पर है। हम केरल से मुकाबला नहीं कर रहे, हम तो अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
- डॉक्टरों का अकाल (WHO मानक): विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि 1000 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए। बिहार में स्थिति यह है कि लगभग 28,000 से 40,000 लोगों पर एक एलोपैथिक डॉक्टर है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो भगवान ही डॉक्टर है। जब डॉक्टर ही नहीं होंगे, तो मरीज पटना या वाराणसी नहीं भागेंगे तो और क्या करेंगे?
- कुपोषण का गढ़ (NFHS-5, 2019-21): जिस प्रदेश के 42.9% बच्चे बौनेपन (Stunted) के शिकार हों और 69% बच्चों में खून की कमी (Anemia) हो, वहाँ का स्वास्थ्य मंत्री चैन की नींद कैसे सो सकता है? यह केवल आंकड़े नहीं हैं, यह बिहार की आने वाली नस्ल की बर्बादी का प्रमाण पत्र है।
- CAG की रिपोर्ट (2021): नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने साफ कहा था कि 2014-19 के दौरान बिहार सरकार ने स्वास्थ्य बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं किया (Unspent)। यानी पैसा था, पर नीयत नहीं थी। अस्पताल में बेड नहीं हैं, दवा नहीं है, और सरकार पैसा दबाए बैठी है। क्या इसे ही ‘सुशासन’ कहते हैं?
रेफरल प्रदेश’ बनने का दर्द
सांसद महोदय के पत्र में एक लाइन है— “BHU ट्रॉमा सेंटर में लगभग 40% मरीज बिहार से आते हैं।” यह लाइन बिहार सरकार के गाल पर एक तमाचा होनी चाहिए। सोचिए, यूपी के एक अस्पताल में आधे मरीज बिहार के हैं! इसका सीधा मतलब है कि बक्सर, कैमूर, रोहतास और भोजपुर में आपने एक भी ऐसा अस्पताल नहीं बनाया जहाँ सर की चोट या गंभीर बीमारी का इलाज हो सके। बिहार एक “रेफरल स्टेट” बन गया है।
- गाँव से जिला अस्पताल रेफर।
- जिला अस्पताल से PMCH रेफर।
- PMCH से AIIMS दिल्ली या BHU रेफर।
और जब मरीज दूसरे राज्य में जाता है, तो वहाँ उसे ‘बिहारी’ होने की वजह से दोयम दर्जे का व्यवहार झेलना पड़ता है, या जैसा कि पत्र में लिखा है—भुगतान न होने पर इलाज रोक दिया जाता है।
निष्कर्ष: चिट्ठी नहीं, इलाज चाहिए!
माननीय सांसद जी, अगली बार जब पत्र लिखें, तो थोड़ा बड़ा पन्ना लीजियेगा। और उस पर साफ-साफ लिखिएगा कि बिहार को ‘बिल भरने वाली सरकार’ नहीं, ‘अस्पताल बनाने वाली सरकार’ चाहिए। अगर 8 करोड़ के बकाये पर इतनी “व्यथा” है, तो सोचिए उन लाखों गरीबों की व्यथा क्या होगी जो व्यवस्था के अभाव में दम तोड़ देते हैं? स्वास्थ्य मंत्री जी को बदलने की मांग महज राजनीतिक नहीं, बल्कि जीवन बचाने की मांग है।
बिहार अब “याचना” नहीं चाहता, बिहार अब “रण” चाहता है। अपनी स्वास्थ्य सुरक्षा का अधिकार चाहता है।
बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर यह व्यांगात्मक विश्लेषण मो॰ दिलशाद आलम (पूर्व नगर युवा अध्यक्ष, जन सुराज पार्टी डेहरी) द्वारा लिखा गया है।
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