वंशवाद के हुए ‘सुशासन बाबू’: लालू का विरोध करने वाले नीतीश भी 1250 परिवारों के क्लब में!

डेहरी ऑन सोन/पटना | जन आक्रोश मीडिया डेस्क

बिहार की राजनीति में दशकों तक ‘वंशवाद’ और ‘परिवारवाद’ के खिलाफ ताल ठोककर अपनी सियासी जमीन मजबूत करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब खुद उसी राह पर चल पड़े हैं। हालिया घटनाक्रम में, जेडीयू के कद्दावर मंत्री और नीतीश कुमार के बेहद करीबी श्रवण कुमार ने स्पष्ट कर दिया है कि मुख्यमंत्री के पुत्र निशांत कुमार सक्रिय राजनीति में कदम रखने जा रहे हैं। श्रवण कुमार इसे “युवाओं की लंबे समय की मांग” और “होली का तोहफा” बता रहे हैं, और कयास लगाए जा रहे हैं कि निशांत को सीधे राज्यसभा भेजा जा सकता है। लेकिन इस ‘तोहफे’ के आवरण के पीछे बिहार की वह कड़वी सच्चाई छिपी है, जिसने दशकों से राज्य के आम युवाओं का हक मारा है।

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सिद्धांतों की तिलांजलि और नीतीश का दोहरा मापदंड

नीतीश कुमार की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी उनका ‘आदर्शवाद’ और परिवारवाद से दूरी रही है। इसी पूंजी के दम पर वे लालू यादव और उनके परिवार—खासकर तेजस्वी यादव—पर तीखे प्रहार करते रहे हैं। तेजस्वी यादव के उपमुख्यमंत्री रहते हुए और बाद में भी, नीतीश कुमार ने कई मंचों से यह स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की कि उनका कोई राजनीतिक वारिस उनके परिवार से नहीं होगा, बल्कि पूरा बिहार ही उनका परिवार है।

लेकिन, निशांत कुमार की इस ‘ग्रैंड एंट्री’ ने सुशासन बाबू के उन तमाम दावों की पोल खोल दी है। बिना किसी जमीनी संघर्ष या राजनीतिक अनुभव के, सीधे सत्ता के शीर्ष (या राज्यसभा) पर अपने 50 वर्षीय बेटे को बिठाने की तैयारी नीतीश कुमार के जीवनभर के उसूलों की सबसे बड़ी हार है। आज उनके और लालू यादव के बीच का वह नैतिक फासला पूरी तरह मिट चुका है।

वंशवाद का कैंसर और बिहार का दुर्भाग्य

बिहार की राजनीति में वंशवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन नीतीश कुमार जैसे नेता का इसमें खुलकर शामिल होना सबसे बड़ी निराशा है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, हर तरफ नेताओं के बेटे-बेटियों की ही लॉन्चिंग चल रही है। आम कार्यकर्ता जीवनभर पार्टी का झंडा ढोता है, लाठियां खाता है, लेकिन जब टिकट या बड़े पद की बात आती है, तो पैराशूट से किसी नेता का बेटा उतार दिया जाता है। श्रवण कुमार भले ही दावा करें कि निशांत का आना ‘युवाओं की मांग’ है, लेकिन सच यह है कि यह सिर्फ सत्ता मोह और अपनी राजनीतिक विरासत को सुरक्षित करने की छटपटाहट है।

जन सुराज का आरोप: 1250 परिवारों का बंधक है बिहार

इस पूरे परिदृश्य को जन सुराज के उस तल्ख़ आरोप के नजरिए से देखना बेहद जरूरी है, जो बिहार की राजनीति का सबसे नंगा और कड़वा सच है। जन सुराज के नेता लगातार यह आंकड़ा जनता के सामने रखते हैं कि बिहार की पूरी सत्ता और संसाधन पिछले 30-40 सालों से महज 1250 से 1300 परिवारों की मुट्ठी में कैद हैं। चाहे कोई भी गठबंधन जीते, किसी भी दल की सरकार बने; विधायक, सांसद, मंत्री और यहां तक कि ब्लॉक स्तर के प्रमुख भी इन्हीं गिने-चुने परिवारों से आते हैं।

निशांत कुमार की यह राजनीतिक ताजपोशी इसी ‘1250 परिवारों के सिंडिकेट’ का एक नया अध्याय है। एक तरफ बिहार का आम और गरीब युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है, वहीं इन रसूखदार परिवारों के बेटे बिना किसी योग्यता या संघर्ष के सीधे सत्ता की मलाई चाखने के लिए लॉन्च किए जा रहे हैं।

निष्कर्ष

नीतीश कुमार ने भले ही अपनी पार्टी का उत्तराधिकारी तय कर लिया हो और जेडीयू नेता इसमें अपना भविष्य देख रहे हों, लेकिन उन्होंने बिहार के उन लाखों युवाओं का भरोसा तोड़ दिया है जो एक गैर-पारिवारिक और पारदर्शी राजनीति की उम्मीद करते थे। निशांत कुमार का राजनीति में आना महज एक व्यक्ति का पदार्पण नहीं है, बल्कि यह बिहार में गहराई तक जड़ें जमा चुके उस राजनीतिक सामंतवाद की जीत है, जिसमें यह तय कर लिया गया है कि राजा का बेटा ही राजा बनेगा। अब वक्त आ गया है कि बिहार की जनता यह तय करे कि क्या वह अनंत काल तक इन्हीं 1250 परिवारों की जागीर बनी रहेगी, या एक नई और सच्ची लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव रखेगी।

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