सच हुआ विश्लेषण, प्रशांत को “सुप्रीम” फटकार!

नई दिल्ली/पटना | जन आक्रोश

बिहार की राजनीति में जिस ‘कानूनी भूचाल’ की आहट जन आक्रोश ने अपनी कल की रिपोर्ट में जताई थी, आज सुप्रीम कोर्ट में उसका पटाक्षेप हो गया। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को देश की सर्वोच्च अदालत से बड़ी निराशा हाथ लगी है।

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार विधानसभा चुनाव, 2025 को रद्द करने और दोबारा चुनाव कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने जन सुराज पार्टी को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि चुनाव हारने के बाद लोकप्रियता हासिल करने के लिए अदालत का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

‘जन आक्रोश’ की खबर पर लगी मुहर

हमने अपनी कल की रिपोर्ट में विश्लेषण किया था कि संविधान का अनुच्छेद 329(b) इस याचिका की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन सकता है। आज कोर्टरूम में ठीक वही हुआ। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया संपन्न होने के बाद सीधे सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती।

कोर्ट रूम में क्या हुआ: जजों की तल्ख टिप्पणियाँ

सुनवाई के दौरान माहौल काफी गर्म रहा। जब जन सुराज के वकीलों ने ‘वोट के बदले नोट’ (10,000 रुपये ट्रांसफर) और ‘जीविका दीदियों’ के दुरुपयोग का मुद्दा उठाया, तो पीठ ने सख्त रुख अपनाया।

CJI सूर्यकांत ने कहा:

“जब जनता आपको नकार देती है, तो आप लोकप्रियता पाने के लिए न्यायिक मंच का उपयोग करते हैं। लोकतंत्र में जनादेश का सम्मान होना चाहिए। हम किसी एक राजनीतिक दल के कहने पर पूरे राज्य के चुनाव को शून्य घोषित नहीं कर सकते।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई उम्मीदवार या पार्टी चुनाव में धांधली का आरोप लगाती है, तो उसके लिए सही रास्ता ‘चुनाव याचिका’ (Election Petition) है, न कि अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका।

अब आगे क्या?: पटना हाई कोर्ट का रास्ता खुला

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, लेकिन जन सुराज के लिए रास्ते पूरी तरह बंद नहीं किए हैं। कोर्ट ने पार्टी को ‘लिबर्टी’ दी है कि वे अपनी शिकायतों को लेकर पटना हाई कोर्ट जा सकते हैं और कानून के मुताबिक चुनाव याचिका दायर कर सकते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

जन सुराज पार्टी ने आरोप लगाया था कि आचार संहिता लागू होने के दौरान राज्य सरकार ने महिला वोटरों को 10,000 रुपये सीधे ट्रांसफर किए, जो कि ‘भ्रष्ट आचरण’ है। इसके अलावा 1.8 लाख जीविका दीदियों को पोलिंग बूथ पर तैनात करने को भी चुनौती दी गई थी।

अब देखना होगा कि क्या जन सुराज पार्टी इस लड़ाई को पटना हाई कोर्ट ले जाती है, या सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद इस मुद्दे को यहीं विराम देती है।

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