कूटनीति: ट्रम्प की गलतियों से सीखेंगे मोदी जी!

मोदी जी, मित्र देशों को ‘आँख और पीठ’ नहीं दिखानी चाहिए, ट्रंप के मौजूदा कूटनीतिक एकांतवास से लें सीख

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति में एक बहुत पुरानी और सटीक कहावत है—”अपने घनिष्ठ मित्रों को कभी आँख और पीठ नहीं दिखानी चाहिए।” ‘आँख दिखाने’ का अर्थ है मित्रों पर अपना रौब या अहंकार जताना, और ‘पीठ दिखाने’ का अर्थ है ज़रूरत के वक्त उन्हें मझधार में छोड़ देना।

वर्तमान में मध्य पूर्व में भड़की अमेरिका-इज़राइल और ईरान की ताज़ा और भयानक जंग ने दुनिया के सामने इस कहावत का सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण पेश कर दिया है। आज जब अमेरिका को वैश्विक मंच पर अपने सबसे पुराने और ताकतवर सहयोगियों की सख्त जरूरत है, तब ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा और स्पेन जैसे NATO देश उसके समर्थन में खड़े होने से साफ कतरा रहे हैं। यह कोई रातों-रात हुआ बदलाव नहीं है, बल्कि डोनल्ड ट्रंप द्वारा बोए गए ‘अहंकार के बीजों’ की ही फसल है।

ट्रंप का कूटनीतिक अहंकार और आज का एकांतवास डोनल्ड ट्रंप ने अपने पहले और वर्तमान कार्यकाल में ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नाम पर अपने ही दोस्तों को लगातार अपमानित किया। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की निजी चैट को सोशल मीडिया पर लीक करना हो, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को सरेआम ‘दोगला’ कहना हो या ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कियर स्टार्मर की नीतियों का मज़ाक उड़ाना हो—ट्रंप ने सार्वजनिक मंचों से अपने सहयोगियों को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

ट्रंप को लगता था कि अमेरिका की आर्थिक और सैन्य ताकत के डर से ये देश हमेशा उनके पीछे खड़े रहेंगे। लेकिन जब पानी सिर से ऊपर चला गया और आज युद्ध का यह नाज़ुक मोड़ आया, तो इन सहयोगी राष्ट्रों ने अपने राष्ट्रीय हितों और आत्मसम्मान को चुना। ब्रिटेन ने अपने सैन्य बेस देने में आनाकानी की, फ्रांस ने इस एकतरफा हमले से पल्ला झाड़ लिया और स्पेन ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। ट्रंप ने जिन दोस्तों को अपने अहंकार में ‘आँख दिखाई’ थी, आज संकट के समय उन्होंने अमेरिका को ‘पीठ दिखा’ दी है।

प्रधानमंत्री मोदी के लिए क्या है सबक? अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के इस बदलते और निर्मम घटनाक्रम में भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक बहुत बड़ा और स्पष्ट संदेश छिपा है। महाशक्ति बनने की राह में केवल ‘सैन्य और आर्थिक ताकत’ काम नहीं आती; संकट के समय में ‘सहयोगियों का भरोसा’ ही सबसे बड़ी ढाल होता है।

भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, आर्थिक और सामरिक हितों के चलते भारत का झुकाव अमेरिका, इज़राइल और पश्चिमी देशों की ओर तेज़ी से बढ़ा है। यह समय की मांग हो सकती है, लेकिन इस प्रक्रिया में हमारे कई पुराने और ‘हर मौसम के मित्र’ खुद को किनारे लगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

  • ईरान का दर्द और कश्मीर का कर्ज: ईरान के साथ भारत के सदियों पुराने सभ्यतागत संबंध रहे हैं। कूटनीतिक इतिहास इस बात का गवाह है कि जब जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर ‘इस्लामिक सहयोग संगठन’ (OIC) और लगभग सभी प्रमुख मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान के सुर में सुर मिला रहे थे, तब इसी ईरान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का ढाल बनकर साथ दिया था और कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते हुए पाकिस्तान के प्रस्ताव को फेल कर दिया था। आज ईरान को यह महसूस होता है कि जिस मित्र के लिए उसने इस्लामिक दुनिया की नाराजगी मोल ली और जिसे चाबहार बंदरगाह के रास्ते मध्य एशिया का सामरिक मार्ग दिया, उसी मित्र ने अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से उसे पीठ दिखा दी।
  • रूस की खामोश नाराज़गी और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का कर्ज: 1971 के युद्ध में जब अमेरिका का सातवां बेड़ा भारत पर हमले के लिए आ रहा था, तब रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) ही था जो ढाल बनकर खड़ा हुआ था। सिर्फ इतिहास ही नहीं, बल्कि हाल ही में मई 2025 में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भी रूस ने भारत का कूटनीतिक साथ दिया और उसी के द्वारा दिए गए S-400 ‘सुदर्शन’ एयर डिफेंस सिस्टम ने दुश्मन के हमलों को नाकाम करने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाई। लेकिन इसके बावजूद, जब बात कच्चे तेल की आई, तो भारत ने कथित तौर पर अमेरिकी दबाव में आकर रूस से तेल खरीदना लगभग बंद कर दिया। आज जब भारत हथियारों के लिए पश्चिमी देशों का रुख कर रहा है और अमेरिका के साथ ‘क्वाड’ (QUAD) में गलबहियां कर रहा है, तो रूस का आशंकित होना और खुद को उपेक्षित महसूस करना स्वाभाविक है।
  • पड़ोसियों का छिटकना और चीन का बढ़ता प्रभाव: अफ़ग़ानिस्तान में संकट के समय वहां के लोकतांत्रिक मित्रों को उनके हाल पर छोड़ देना हो, या नेपाल और मालदीव जैसे बेहद करीबी पड़ोसियों के आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप और ‘दबाव की राजनीति’ (Pressure Politics) के आरोप हों—ये सभी कूटनीतिक विफलता के स्पष्ट संकेत हैं। आज स्थिति यह है कि नेपाल और मालदीव जैसे देश, जो कभी पूरी तरह से भारत के प्रभाव क्षेत्र में थे, अब तेज़ी से चीन की ओर झुक रहे हैं। चीन के साथ उनकी यह बढ़ती नज़दीकियां न केवल भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति पर सवालिया निशान लगाती हैं, बल्कि हमारी रणनीतिक घेराबंदी (Strategic Encirclement) के खतरे को भी बढ़ाती हैं।

निष्कर्ष कूटनीति में नए दोस्त बनाना आवश्यक है, लेकिन पुराने और परखे हुए दोस्तों की कीमत पर नहीं। डोनल्ड ट्रंप की वर्तमान दुर्दशा इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि जब आप अपने मित्रों को केवल अपनी सुविधा का साधन समझते हैं, तो युद्ध के मैदान में आप खुद को नितांत अकेला पाते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी को ट्रंप की इस ऐतिहासिक कूटनीतिक भूल से यह सीख लेनी चाहिए कि अमेरिका जैसे नए शक्तिशाली मित्रों का स्वागत ज़रूर हो, लेकिन रूस, ईरान और अपने पड़ोसियों जैसे उन पुराने मित्रों को कभी ‘आँख या पीठ’ न दिखाई जाए, जिन्होंने भारत के मुश्किल वक्त में अपना कंधा दिया था। क्योंकि इतिहास गवाह है—वक्त पर जो काम आए, अंततः वही सच्चा मित्र होता है।

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