प्रस्तावना: एक तरफ अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देश युद्ध की आग में जल रहे क्षेत्रों से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकाल रहे हैं, और दूसरी तरफ हमारी सरकारें अपने ही युवाओं को मौत के मुहाने पर भेजने की आधिकारिक निविदाएं (Tenders) निकाल रही हैं। हाल ही में बिहार सरकार के युवा, रोजगार एवं कौशल विकास विभाग ने राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (NSDC) के साथ मिलकर 3500 ‘होम बेस्ड केयरगिवर’ के पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी किया है। विडंबना यह है कि इन युवाओं को रोज़गार के नाम पर जिस स्थान पर भेजा जा रहा है, वह कोई सुरक्षित देश नहीं, बल्कि ‘इज़रायल अधिकृत फ़िलिस्तीन’ का वह अशांत और युद्धग्रस्त इलाका है जहाँ अब हर दिन मौत बरस रही है और सायरन गूँजते हैं।

बिहार सरकार के ‘सुशासन’ और डबल इंजन के दावों की खुली पोल
केंद्र और राज्य में सत्तासीन ‘डबल इंजन’ सरकारें हर मंच से औद्योगीकरण, निवेश और रोज़गार सृजन के बड़े-बड़े दावे करती हैं। लेकिन ‘सुशासन’ का ढिंढोरा पीटने वाली बिहार सरकार की ज़मीनी हकीकत इन दावों से कोसों दूर है। डेहरी और रोहतास जैसे क्षेत्रों से लेकर पूरे बिहार तक, युवा भयानक बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। राज्य में सम्मानजनक आजीविका के अवसरों का इतना घोर अभाव है कि बिहार के युवा अब ₹1.5 से ₹2 लाख प्रतिमाह के वेतन के लालच में मौत का जोखिम उठाने को विवश हैं। यह कोई ‘सुनहरा अवसर’ नहीं है, बल्कि एक लोककल्याणकारी राज्य के रूप में पटना में बैठे हुक्मरानों की सबसे बड़ी नाकामी का जीता-जागता प्रमाण है। जब बिहार सरकार अपने युवाओं को उनके घर में काम नहीं दे सकती, तो उन्हें एक सक्रिय वॉर-ज़ोन में धकेलना राज्य सरकार की नीतियों के दिवालियेपन को दर्शाता है।

अवैध कब्ज़े को परोक्ष समर्थन और मज़दूरों का शोषण
इस निविदा का एक और स्याह पहलू है, जो अंतरराष्ट्रीय नैतिकता के खिलाफ जाता है। ‘इज़रायल अधिकृत फ़िलिस्तीन’ में लंबे समय से चल रहा अवैध कब्ज़ा और दमनकारी नीतियां पूरी दुनिया में आलोचना का विषय रही हैं। हालिया युद्ध शुरू होने के बाद, वहां से स्थानीय फ़िलिस्तीनी कामगारों के वर्क परमिट रद्द कर दिए गए और उन्हें निकाल दिया गया, जिससे वहां भारी श्रम संकट पैदा हो गया है। उस शून्य को भरने के लिए बिहारी मज़दूरों को वहां भेजना केवल हमारे युवाओं की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं है, बल्कि यह एक दमनकारी व्यवस्था और अवैध कब्ज़े को परोक्ष रूप से ‘श्रम-समर्थन’ (Labor Support) देने जैसा है। हम बेरोज़गारी के नाम पर किसी दूसरे की ज़मीन पर कब्ज़ा करने वाली व्यवस्था के साझीदार क्यों बनें?
सुरक्षा का टूटता भ्रम और आर्थिक विवशता का क्रूर फायदा
भर्ती दस्तावेज़ों पर नज़र डालें तो साफ़ होता है कि यह कोई आसान रोज़गार नहीं है। इन युद्धग्रस्त क्षेत्रों में जाने के लिए भी बेरोज़गार युवाओं को मेडिकल, वीज़ा, फ्लाइट और प्लेसमेंट ब्यूरो की फीस के नाम पर हज़ारों रुपये अपनी जेब से खर्च करने पड़ रहे हैं। क्या बिहार सरकार का दायित्व केवल एक ‘रिक्रूटमेंट एजेंसी’ बनकर कमीशन और फीस तय करने तक सीमित रह गया है?
सबसे खौफनाक बात यह है कि इज़रायल की तथाकथित अभेद्य सुरक्षा का भ्रम भी अब पूरी तरह टूट चुका है। युद्ध का दायरा अब केवल गाज़ा या लेबनान सीमा तक सीमित नहीं है। हाल ही में पूरी दुनिया ने देखा कि किस प्रकार ईरान ने तेल अवीव और इज़रायल के अन्य मुख्य शहरों पर सीधा और विनाशकारी हमला किया। ईरान की मिसाइलों ने इज़रायल के मशहूर ‘आयरन डोम’ (Iron Dome) और अन्य उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम को पूरी तरह चकमा देकर सीधे मुख्य भूभागों पर तबाही मचाई। ऐसे में, जब इज़रायल के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले शहर ही मिसाइलों की ज़द में हैं, तो वहां हमारे मज़दूर जान बचाने के लिए कहाँ भागेंगे? जब वहां काम करते हुए किसी बिहारी मज़दूर के सिर पर मिसाइल गिरेगी, तो उस जान-माल की ज़िम्मेदारी क्या बिहार के मुख्यमंत्री लेंगे?
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निष्कर्ष: यह स्थिति सत्ता के गलियारों में बैठे नीति-निर्माताओं से एक सीधा सवाल पूछती है—क्या बिहार के युवाओं का जीवन इतना सस्ता हो गया है कि रोज़गार के नाम पर उन्हें एक विदेशी युद्ध में झोंक दिया जाए? यह वक़्त कागज़ी दावों और विज्ञापनों से बाहर निकलकर, ज़मीन पर वास्तविक रोज़गार पैदा करने का है। बिहार सरकार को आजीविका के नाम पर मौत का सौदा करने वाली ऐसी निविदाएं तुरंत वापस लेनी चाहिए, क्योंकि कोई भी वेतन किसी युवा की जान से ज़्यादा कीमती नहीं हो सकता।
यह महज़ एक ख़बर नहीं, बल्कि हमारे बिहार के उन हज़ारों बेबस युवाओं की ज़िंदगी का सवाल है जिन्हें रोज़गार के नाम पर मौत के मुहाने पर धकेला जा रहा है। सत्ता की इस विफलता और असंवेदनशीलता के खिलाफ आवाज़ उठाना हम सबकी साझा ज़िम्मेदारी है। ‘जन आक्रोश मीडिया’ की इस रिपोर्ट को अपने परिवार, दोस्तों और हर उस युवा तक ज़रूर शेयर करें, जो आर्थिक मजबूरी में इस ‘मृत्युपत्र’ पर हस्ताक्षर करने की सोच रहा है। आपकी एक शेयरिंग शायद किसी घर के चिराग को बुझने से बचा ले। सच को जन-जन तक पहुँचाने की इस मुहिम में हमारा साथ दें और इस ख़बर को ज़्यादा से ज़्यादा साझा करें।