मो० दिलशाद आलम | जन आक्रोश मीडिया | डेहरी
8 मई 2026 की तारीख पटना की सड़कों पर एक बार फिर गवाह बनी कि जब भी बिहार का युवा अपने हक़ की आवाज़ उठाता है, तो सत्ता उसे जवाब में क्या देती है। BPSC TRE-4 शिक्षक भर्ती के नोटिफिकेशन की मांग को लेकर जेपी गोलंबर पर जुटे हजारों निहत्थे अभ्यर्थियों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया। सिर फूटे, खून बहा और एक बार फिर ‘सुशासन’ के दावों पर पुलिसिया बूटों की छाप छोड़ दी गई। लेकिन ठहरिए, क्या यह कोई नई बात है? क्या यह किसी प्रशासनिक चूक का नतीजा है? बिल्कुल नहीं। यह एक स्थापित परंपरा है, और सच तो यह है कि यह लाठी सरकार ने नहीं चलाई है, बल्कि इसे खुद बिहार ने चुना है।

भारत का संविधान, अपने अनुच्छेद 19 के तहत, हर नागरिक को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का मौलिक अधिकार देता है। लेकिन बिहार में यह अधिकार ‘धारा 144’ और ‘यातायात बाधित होने’ जैसे सरकारी बहानों की भेंट चढ़ जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला देकर पटना के गर्दनीबाग को ‘चिन्हित धरना स्थल’ बना दिया गया है। लेकिन इसका असल मकसद क्या है? क्या यह प्रदर्शनकारियों की सुविधा के लिए है? नहीं। इसका इकलौता मकसद यह है कि “माननीयों को कोई तकलीफ़ ना हो।” गर्दनीबाग सत्ता के गलियारों से दूर एक ऐसा ‘डंपिंग ग्राउंड’ है, जहाँ जनता महीनों चीखती रहे, तो भी उसकी गूँज हुक्मरानों के वातानुकूलित कमरों तक नहीं पहुँचती। जनता की तकलीफें उन्हें अपने वीवीआईपी रास्तों पर रोज़ दिखाई ना दें, इसलिए उन्हें वहाँ कैद कर दिया जाता है। और जब कोई अनसुनी से तंग आकर अपनी आवाज़ सचिवालय तक पहुँचाने के लिए उस लक्ष्मण रेखा को लांघता है, तो प्रशासन ‘कानून-व्यवस्था’ का डंडा लेकर टूट पड़ता है।
लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा और कड़वा सच पुलिस या प्रशासन नहीं, बल्कि हमारी राजनीति है।
बीते कई दशकों से बिहार के लगभग हर वर्ग—छात्र, शिक्षक, किसान, संविदा कर्मी—ने अपने हक़ के लिए आंदोलन किया और बदले में सिर्फ लाठियाँ खाईं। इन दशकों में गठबंधन भले ही बदलते रहे हों, लेकिन सत्ता का केंद्र कहीं ना कहीं सिर्फ और सिर्फ नीतीश कुमार ही रहे हैं। उनके ‘सुशासन’ में लाठीरूपी इस आशीर्वाद से कोई अछूता नहीं रहा। यहाँ तक कि आज जो भाजपा उनके साथ सत्ता में बैठकर मलाई काट रही है, जब वह विपक्ष में थी, तो 13 जुलाई 2023 को विधानसभा मार्च के दौरान उसने भी इसी लाठी का स्वाद चखा था।
आज भले ही कुर्सी से उठकर अघोषित रूप से नीतीश कुमार भाजपा के ‘मार्गदर्शक मंडल’ में चले गए हों, लेकिन उनके चेले यानी सम्राट चौधरी भी अपने गुरु की इस महान परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे गुरु जी अपने शिष्य को एक बड़ा राजनीतिक ‘सीक्रेट’ बताकर गए हैं: “बिहारी जितना लाठी खायेगा, हमें उतनी सीटें मिलेंगी।” यहाँ ज्यादा लाठी का सीधा मतलब है ज्यादा सीटों की गारंटी।
अगर किसी महानुभाव को यह बात बुरी लग रही हो, तो जरा अपने गिरेबान में झाँक कर एक सवाल का जवाब दें: जब नीतीश जी के फैसलों के खिलाफ लगभग सभी वर्गों ने आंदोलन किया, खून बहाया और प्रसाद में सिर्फ लाठी ही खाई, यानी जब इतनी भयंकर एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) थी, तो फिर चुनाव के दिन भर-भर कर EVM उसी चेहरे के नाम पर क्यों दबाई गई? नीतीश कुमार चाहे किसी भी दल के गठबंधन में रहे हों, लोगों ने लाठी का बदला उन्हें और उनके गठबंधन को वोट देकर ही चुकाया है।
जब आप उस सत्ता को बार-बार अपने कंधों पर बिठाते हैं जिसने आपकी पीठ को लाठियों से लाल किया हो, तो फिर शिकायत किस बात की? इस बर्बरता के लिए सिर्फ सिस्टम को दोष देना बंद कीजिए। लोकतंत्र में सरकारें वही करती हैं जो जनता उन्हें करने की छूट देती है।
पटना की सड़कों पर अभ्यर्थियों का बहता खून कोई दुर्घटना नहीं है, यह एक चुनावी पसंद का नतीजा है। सच यही है, कड़वा है, लेकिन यही है— “बिहार ने चुनी है ये लाठी।”
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