RTI का मज़ाक: फाइलों पर कुंडली मारे बैठे DM-SP, CM सम्राट से शिकायत!

डेहरी | जन आक्रोश मीडिया: बिहार में ‘सुशासन’ और ‘पारदर्शिता’ के दावों की जमीनी हकीकत क्या है, इसका जीता-जागता प्रमाण रोहतास और आसपास के जिलों के सरकारी कार्यालयों में देखने को मिल रहा है। ‘सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005’ (RTI Act) को यहाँ के अधिकारियों ने महज एक मज़ाक बनाकर रख दिया है। जनता के सवालों से बचने के लिए अधिकारी महीनों तक आवेदनों को दबाए बैठे हैं। इस घोर प्रशासनिक लापरवाही और कानून के खुले उल्लंघन के खिलाफ अब सीधे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कार्यालय में पुख्ता सबूतों के साथ शिकायत दर्ज कराई गई है।

‘जानकारी 2.0’ पोर्टल ने खोली प्रशासन की पोल

राज्य सरकार द्वारा पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए बनाए गए ‘जानकारी 2.0’ (Jaankari 2.0) पोर्टल के आंकड़े स्वयं विभागीय सुस्ती की गवाही दे रहे हैं। जनहित और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े कई महत्वपूर्ण आरटीआई आवेदन तय समय-सीमा बीत जाने के बाद भी महीनों से लंबित हैं:

  • शिक्षा विभाग: 88 दिनों से पेंडिंग
  • जिलाधिकारी (DM) कार्यालय, रोहतास: 87 दिनों से पेंडिंग
  • पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय, रोहतास: 70 दिनों से पेंडिंग
  • जिलाधिकारी कार्यालय, औरंगाबाद: 66 दिनों से पेंडिंग

सरकारी वाहनों की जांच के नाम पर साधी चुप्पी

प्रशासन की यह चुप्पी तब और भी संदिग्ध हो जाती है जब सवाल स्वयं सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर उठते हैं। रोहतास जिले में ‘नियमों का उल्लंघन करने वाले सरकारी वाहनों’ (बिना फिटनेस, बीमा, PUC और बिना नंबर प्लेट वाले वाहन) पर की गई कार्रवाई का स्पष्ट आंकड़ा आरटीआई के माध्यम से माँगा गया था। इस ज्वलंत मुद्दे पर क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकार, पटना द्वारा आवेदन रोहतास के जिला परिवहन पदाधिकारी को हस्तांतरित [धारा 6(3) के तहत] तो किया गया, लेकिन उसके बाद से विभाग ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब सरकारी गाड़ियों के चालान का हिसाब माँगा गया, तो सिस्टम ने रहस्यमयी चुप्पी साध ली।

कानून की इन धाराओं की उड़ रही धज्जियां

अधिकारियों का यह टालमटोल वाला रवैया सीधे तौर पर RTI अधिनियम की कई महत्वपूर्ण धाराओं का स्पष्ट उल्लंघन है:

  • धारा 7(1) और 7(2): 30 दिन की समय-सीमा पार करना और जानबूझकर सूचना न देकर ‘कल्पित अस्वीकृति’ (Deemed Refusal) करना।
  • धारा 6(3) का मज़ाक: एक विभाग से दूसरे विभाग को स्थानांतरित किए गए आवेदनों पर पूर्ण निष्क्रियता।
  • धारा 7(8) का उल्लंघन: बिना कोई वैधानिक कारण बताए या बिना छूट के प्रावधानों का संदर्भ दिए आवेदनों को मनमाने ढंग से खारिज (Reject) कर देना।
  • धारा 19(1): प्रथम अपीलीय प्राधिकारियों (FAA) का गैर-जिम्मेदाराना रवैया, जहाँ अपील दायर करने के महीनों बाद भी कोई सुनवाई नहीं की जा रही है।

अब मुख्यमंत्री के कड़े फैसले का इंतजार

इस पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट और पोर्टल के ‘पेंडिंग स्टेटस’ के अकाट्य प्रमाण ईमेल के माध्यम से मुख्यमंत्री सचिवालय को भेज दिए गए हैं। ‘जन आक्रोश मीडिया’ के संस्थापक एवं एडिटर मो. दिलशाद आलम द्वारा की गई इस उच्च स्तरीय शिकायत में मांग की गई है कि आरटीआई कानून को पंगु बनाने वाले इन बेलगाम लोक सूचना अधिकारियों पर अधिनियम की धारा 20 के तहत कड़ी दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

अब पूरी निगाहें राज्य के शीर्ष नेतृत्व पर टिकी हैं। देखना यह है कि क्या जनहित से जुड़े इस मुद्दे पर लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है, या फिर पारदर्शिता और सुशासन के दावे फाइलों के बोझ तले ही दबे रह जाते हैं।

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