कपटी “ज्ञानी” से दबकर तिल-तिल मारता चुनाव आयोग?

नई दिल्ली | जन आक्रोश मीडिया

चुनाव आयोग जैसी प्रतिष्ठित और निष्पक्ष संस्था के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की हालिया इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट ने इस संवैधानिक संस्था के भीतर चल रहे गहरे विवाद और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग अपने ही दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को दरकिनार कर मनमाने फैसले ले रहा है।

यह सनसनीखेज खुलासा ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी पत्रकार रितिका चोपड़ा और दामिनी नाथ की बेहतरीन इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म का नतीजा है। उनकी रिपोर्ट के बिना, देश की जनता को यह पता ही नहीं चलता कि चुनाव आयोग के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं किस तरह खतरे में हैं।

विवाद की जड़: क्या है ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) और फॉर्म 6 का मुद्दा?
इस पूरे विवाद के केंद्र में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया और नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘फॉर्म 6’ में किए गए बदलाव हैं। रिपोर्ट बताती है कि पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिए गए फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराई हैं।

उनका मुख्य आरोप यह है कि मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले उनकी सहमति या जानकारी के बिना ही ले लिए गए।

  • फॉर्म 6 में अवैध बदलाव:नए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 में बदलाव कर यह पूछा गया कि क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR सूची में था।दोनों चुनाव आयुक्तों (संधू और जोशी) ने मई में ही लिखित रूप से चेतावनी दी थी कि बिना सरकार की अनुमति और नियमों (Registration of Electors Rules, 1960) में संशोधन किए, इस फॉर्म में बदलाव करना “अवैध और अनाधिकृत” है।इसके बावजूद यह बदलाव लागू कर दिया गया।
  • शक्तियों का केंद्रीकरण:दोनों आयुक्तों ने चुनाव आयोग के आईटी सिस्टम और वोटर डेटाबेस (ECINet) के दिल्ली में केंद्रीकरण पर भी गंभीर चिंता जताई।उनका आरोप है कि इससे ग्राउंड लेवल के अधिकारियों (ERO) के वैधानिक अधिकार छिन रहे हैं।गोवा का उदाहरण सामने आया जहां योग्य मतदाताओं के होने के बावजूद, केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर ने ERO को उनके फैसले दर्ज करने से रोक दिया, जिससे 97 लोग मतदाता सूची में शामिल होने से वंचित रह गए।
  • कैबिनेट सेक्रेटरी से शिकायत:मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब आईटी विभाग के कामकाज के आवंटन में मनमाने बदलाव हुए, तो दोनों चुनाव आयुक्तों को कैबिनेट सेक्रेटरी को पत्र लिखकर शिकायत करनी पड़ी।

विपक्ष का हमला और मांगें
इन खुलासों के बाद विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, टीएमसी (TMC), सीपीएम (CPM) और शिवसेना (UBT) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोला है।विपक्ष पहले से ही वोटर लिस्ट से करोड़ों नाम काटे जाने (SIR प्रक्रिया के तहत 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं) का विरोध कर रहा था।

अब, जब खुद चुनाव आयोग के भीतर से ही “अवैध और अनाधिकृत” कार्यप्रणाली की आवाज़ें उठी हैं, तो विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सख्त कार्रवाई, यहाँ तक कि उन्हें हटाने (impeachment) की मांग तेज़ कर दी है।

आगे क्या?
चुनाव आयोग ने इस रिपोर्ट पर एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा है कि यह मतभेद “निर्णय लेने की सामान्य प्रक्रिया” का हिस्सा हैं। लेकिन यह स्पष्टीकरण उन गंभीर सवालों के जवाब नहीं देता जो फॉर्म 6 में अवैध बदलाव, शक्तियों के केंद्रीकरण, और बिना बहुमत के लिए गए फैसलों के संबंध में उठाए गए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत आयोग का कामकाज सर्वसम्मति या बहुमत से होना चाहिए, लेकिन यहां बहुमत (दो आयुक्त) खुद फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं।

अब अपने ही सह चुनाव आयुक्तों द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब ज्ञानेश कुमार क्या और कब देते हैं इसका इंतज़ार सभी को है।

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