डेहरी ऑन सोन | जन आक्रोश मीडिया
भारत का लोकतंत्र कहने को ‘जनता का, जनता के लिए’ है, लेकिन असल में यह ‘जिल्लेइलाहियों’ का, ‘जिल्लेइलाहियों’ के लिए, और ‘जिल्लेइलाहियों’ के द्वारा चलाया जा रहा एक भव्य इवेंट बन चुका है। मरणोपरांत किसी नेता को याद करना या उसके नाम पर योजनाएं चलाना एक बात है, लेकिन जिंदा रहते हुए खुद को मसीहा, भगवान या ‘जिल्लेइलाही’ घोषित करवा लेना इस देश के सियासतदानों की बहुत पुरानी, लाइलाज और संक्रामक बीमारी है। इतिहास के पन्ने पलटें, तो साफ हो जाता है कि इस फेहरिस्त में कोई दूध का धुला नहीं है। सत्ता के सिंहासन पर बैठते ही हर किसी को अपना अक्स मुकम्मल खुदा जैसा दिखने लगता है।

व्यक्ति पूजा की नींव: ‘चाचा’ से लेकर ‘इंडिया इज़…’ तक
इस चाटुकारिता और व्यक्ति पूजा की नींव उसी दौर में पड़ गई थी जिसे हम आधुनिक लोकतंत्र का पालना कहते हैं। जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री के जन्मदिन को ‘बाल दिवस’ का नाम देकर सरकारी तंत्र और स्कूलों में उनके ‘चाचा’ होने का महिमामंडन शुरू हुआ, तभी यह तय हो गया था कि इस देश में नेता को इंसान नहीं, अवतार माना जाएगा। यह बीमारी आगे चलकर और विकराल हुई। आपातकाल के दौर में एक नेता का कद देश के अस्तित्व से भी बड़ा कर दिया गया—”इंदिरा ही इंडिया है, और इंडिया ही इंदिरा है।” उस दौर में भी सरकारी मशीनरी, ट्रेनें, बसें और बाबू, सब एक नेता के कदमों में बिछा दिए गए थे।
निजी जलसों में ‘राजशाही’ लूट: खौफ और सत्ता का नंगा नाच
जब बात सत्ता के अहंकार और निजी आयोजनों के लिए राजशाही फरमानों की हो, तो बिहार का वह ‘जंगल राज’ कैसे भूल सकते हैं जिसने लोकतंत्र को सीधे-सीधे गुंडई में तब्दील कर दिया था। लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के शासनकाल में जब मुख्यमंत्री आवास पर बेटियों की शादियों की शहनाई बजती थी, तो पूरे पटना शहर में व्यापारियों का जनाज़ा निकलता था। वीआईपी मेहमानों को ढोने के लिए पटना के कार शोरूमों से नई-नवेली, बिना नंबर वाली गाड़ियाँ राजद के गुंडों द्वारा सरेआम उठवा ली जाती थीं। शोरूमों से सोफे, गद्दे, कुर्सियां और सजावट का सामान बिना पैसे दिए लूट लिया जाता था। उस वक्त पुलिस, डीएम, और एसपी जैसे बड़े-बड़े साहब इस ‘शाही डकैती’ के मूक दरबारी बने रहते थे। सत्ता का वह दौर बताता है कि कैसे एक परिवार के निजी जलसे के लिए पूरी स्टेट मशीनरी ने अपनी रीढ़ की हड्डी गिरवी रख दी थी।
त्रासदी पर नाचता ‘समाजवाद’: सैफई के ठुमके और लंदन की बुग्गी
समाजवाद का चोला ओढ़ने वाले भी राजशाही के इस हमाम में पूरी तरह नंगे नज़र आते हैं। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव का दौर सत्ता की उस संवेदनहीनता का गवाह रहा है, जहाँ जनता की चिताओं पर जश्न मनाए गए। 2014 की कड़कड़ाती ठंड में जब मुजफ्फरनगर दंगों के विस्थापित बच्चे राहत शिविरों में दम तोड़ रहे थे, तब पूरी यूपी सरकार सैफई में करोड़ों का सरकारी फंड फूंक कर बॉलीवुड सितारों के ठुमके देख रही थी। सत्ता का अहंकार ऐसा था कि पूछने पर मंत्री कहते थे कि ‘मौतें तो महलों में भी होती हैं।’ इतना ही नहीं, मुलायम सिंह यादव के 75वें जन्मदिन पर पूरी की पूरी यूपी सरकार रामपुर में शिफ्ट हो गई थी। खुद को गरीबों का नेता कहने वाले मुलायम सिंह लंदन से मंगवाई गई 70 लाख की विक्टोरियन बुग्गी में सवार थे और अखिलेश यादव के 40 मंत्री उनके पीछे दरबारी बनकर चल रहे थे।
क्षेत्रीय क्षत्रप: जन्मदिन या सरकारी खजाने की लूट?
राष्ट्रीय नेताओं और बाहुबलियों ने जो रास्ता दिखाया, अन्य क्षेत्रीय क्षत्रपों ने उस पर दौड़ लगा दी। सामाजिक न्याय के नाम पर सत्ता में आईं मायावती के जन्मदिन पर जब करोड़ों के सरकारी खजाने से ‘जन कल्याणकारी दिवस’ मनाया जाता था, तब पूरा प्रशासन केक काटने और भीड़ जुटाने में लगा होता था। दक्षिण में जयललिता के जन्मदिन पर पूरा का पूरा सरकारी अमला उनके कदमों में दंडवत हो जाता था।
वर्तमान निज़ाम: आपदा में ‘इवेंट’ और डिजिटल चाटुकारिता
और अब बात वर्तमान दौर की, जहाँ यह बीमारी अपने चरम पर है। तरीके बदल गए हैं, लेकिन फितरत वही है। कल जहाँ नेताओं के निजी आयोजनों के लिए शोरूम लूटे जाते थे और बुग्गियां मंगवाई जाती थीं, आज वहां ‘सरकारी फरमान’ निकाले जा रहे हैं। आज जब बिहार के 15 जिले बाढ़ के पानी में डूब रहे हैं, लाखों लोग तिरपाल के नीचे भूखे-प्यासे रात गुजार रहे हैं, राज्य के पुल ताश के पत्तों की तरह ढह रहे हैं और बेरोजगार युवा सड़कों पर लाठियां खा रहे हैं, तब सरकारी मशीनरी क्या कर रही है? वह ‘जिल्लेइलाही’ के 76वें जन्मदिन पर ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने की गिनती कर रही है। अब चाटुकारिता के लिए बाकायदा चिट्ठियां निकल रही हैं कि किस स्कूल में कम से कम 25 दीये जलेंगे और कहाँ 100। और सिर्फ दीये नहीं जलाने हैं, व्हाट्सएप पर फोटो भेजकर अपनी वफादारी का डिजिटल प्रमाण भी देना है। अधिकारी आपदा प्रबंधन छोड़कर, सत्ताधीशों के ‘इवेंट मैनेजर’ बन गए हैं।
हकीकत यह है कि इस देश में राजतंत्र कभी खत्म ही नहीं हुआ, उसने बस लोकतंत्र का चोला पहन लिया है। चेहरे बदले, पार्टियां बदलीं, नारे बदले—किसी ने शोरूम लुटवाकर अपनी ताकत दिखाई, किसी ने दंगों के बीच सैफई में जश्न मनाया, तो कोई बाढ़ की विभीषिका के बीच दीये गिनवा रहा है—लेकिन सत्ता का वह अहंकार और व्यक्ति पूजा की वह सड़ांध नहीं बदली। जब तक इस देश की जनता और प्रशासनिक तंत्र इन ‘ज़िंदा खुदाओं’ की चौखट पर सिर रगड़ना बंद नहीं करेगा, तब तक लोकतंत्र ऐसे ही सिसकता रहेगा, और हर दौर का ‘जिल्लेइलाही’ अपनी महिमा के गीत सुनता रहेगा।