Shhhh! जल जमाव की शिकायत ना करें, “ये तो सामान्य बात है”: छपरा नगर निगम

छपरा | जन आक्रोश मीडिया

कल्पना कीजिए, आपके शहर की मुख्य सड़कें तालाब बन चुकी हैं, ऐतिहासिक चौराहों के गेट टूटकर गिर रहे हैं, और घरों का गंदा पानी सीधे सड़क पर बह रहा है। आप एक जिम्मेदार नागरिक की तरह सरकार के ‘सहयोग पोर्टल’ पर इसकी शिकायत करते हैं। और वहां से नगर निगम का जवाब आता है— बारिश हो रही है, तो जलजमाव होना तो लाजमी (स्वाभाविक) है!

यह कोई व्यंग्य नहीं है, बल्कि 1864 में स्थापित देश की सबसे पुरानी नगर पालिकाओं में से एक, छपरा नगर निगम की कड़वी और शर्मनाक सच्चाई है। सहयोग पोर्टल पर दर्ज एक शिकायत (पंजीकरण संख्या – REF592705) के आलोक में छपरा के उप नगर आयुक्त द्वारा दिया गया जाँच प्रतिवेदन इसी नौकरशाही और असंवेदनशीलता का जीता-जागता प्रमाण है।

“जलजमाव लाजमी है” — प्रशासन का गैर-जिम्मेदाराना कुतर्क
जब आम जनता जलभराव की समस्या से त्रस्त होकर समाधान मांगती है, तो नगर निगम के अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए लिखित जवाब देते हैं कि “संबंधित स्थलों पर जल-निकासी हेतु पक्का नाला का निर्माण किया गया है”। लेकिन इसके तुरंत बाद वे अपनी ही नाकामी को प्रकृति के मत्थे मढ़ते हुए लिखते हैं, “वर्षा को दृष्टिगत रखते हुए वाटर लॉगिंग लाजमी है”

अधिकारियों का यह तर्क कि “सामान्य दिनों में नाला का पानी नाले के माध्यम से निकल जाता है”, अपने आप में हास्यास्पद है। सामान्य दिनों (बिना बारिश के) में तो वैसे भी जलजमाव की समस्या नहीं होती। नगर निगम के पक्के नालों की असली परीक्षा तो बारिश में ही होती है। यदि करोड़ों रुपये खर्च करके बनाए गए नालों के बावजूद बारिश का पानी सड़कों पर ही रहना “लाजमी” है, तो फिर नगर निगम के इंजीनियरिंग विभाग और इन नालों के निर्माण का औचित्य ही क्या रह जाता है? यह जवाब जनता के टैक्स के पैसों की बर्बादी और प्रशासनिक लापरवाही का सीधा कबूलनामा है।

जिन मुद्दों पर प्रशासन ने साध ली ‘चुप्पी’
हैरानी की बात यह है कि शिकायतकर्ता ने केवल जलजमाव का मुद्दा नहीं उठाया था, बल्कि ऐतिहासिक शहर की बदहाली की पूरी तस्वीर सामने रखी थी। लेकिन उप नगर आयुक्त की इस रिपोर्ट में उन सभी गंभीर मुद्दों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया:

  • दरोगा राय चौक की दुर्दशा: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के नाम पर बने इस अहम गोलंबर का मुख्य गेट पूरी तरह से क्षत-विक्षत अवस्था में है। प्रशासन ने जलजमाव की तस्वीरें तो खींच लीं, लेकिन इस ऐतिहासिक चौक के रखरखाव पर एक शब्द नहीं कहा।
  • राजेंद्र कॉलेज और बस स्टैंड की बदहाली: देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नाम पर स्थापित ऐतिहासिक कॉलेज के मुख्य द्वार के बाहर की दुर्दशा और कीचड़ से सने बस स्टैंड के विषय में प्रशासन ने कोई भी सफाई या कार्ययोजना प्रस्तुत नहीं की।
  • महापुरुषों की विरासत का अपमान: म्युनिसिपल चौक पर स्थित देश के प्रथम राष्ट्रपति की प्रतिमा के आस-पास का खस्ताहाल परिवेश।

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क्षेत्राधिकार की आड़ में लापरवाही या प्रशासनिक असंवेदनशीलता?

  • रिविलगंज में सड़क पर बहता गंदा पानी: शिकायत में स्पष्ट रूप से बताया गया था कि रिविलगंज प्रखंड क्षेत्र में नाली या ‘सोक पिट’ के अभाव में लोगों के घरों का गंदा पानी सीधे मुख्य सड़क पर बह रहा है, जिससे पूरा इलाका खुली नाली में तब्दील हो चुका है। यह सच है कि रिविलगंज प्रखंड तकनीकी रूप से छपरा नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है, लेकिन क्या महज क्षेत्राधिकार का बहाना बनाकर अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ सकते हैं? सरकारी कार्यप्रणाली और लोक शिकायत निवारण के स्थापित प्रोटोकॉल के अनुसार, नगर निगम को यह शिकायत संबंधित विभाग (रिविलगंज बीडीओ या नगर पंचायत) को विभागीय पत्र लिखकर हस्तांतरित करनी चाहिए थी। साथ ही, शिकायतकर्ता को भी इस प्रक्रिया से अवगत कराना चाहिए था। लेकिन नगर निगम ने इस पर पूरी तरह चुप्पी साध ली। यह मौन न केवल प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाता है, बल्कि ‘सहयोग पोर्टल’ जैसे मंचों की मूल भावना के साथ भी सीधा खिलवाड़ है।

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जनता की आवाज़ को दबाने की कोशिश
प्रशासन द्वारा 27 जुलाई 2026 को ली गई जीपीएस (GPS) तस्वीरें संलग्न कर यह साबित करने की कोशिश की गई है कि सब कुछ नियंत्रण में है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह जाँच प्रतिवेदन एक ‘रबर-स्टैंप’ कार्रवाई से ज्यादा कुछ नहीं है। जो शहर चिरांद जैसी 4500 साल पुरानी सभ्यता का गवाह रहा है, आज उसके अधिकारी नागरिकों की बुनियादी सुविधाओं की मांग को “लाजमी” बताकर खारिज कर रहे हैं।

यह रवैया एक खतरनाक संकेत है। यह बताता है कि व्यवस्था अब जनता की समस्याओं को हल करने के बजाय, उन्हें यह सिखाने में लग गई है कि समस्याओं के साथ जीना सीख लो। जलजमाव, गंदगी और टूटी सड़कें अब छपरा की नियति मान ली गई हैं, और प्रशासन चाहता है कि आप इस पर सवाल न उठाएं।

लेकिन सवाल तो पूछे जाएंगे। क्या नगर निगम सिर्फ “सामान्य दिनों” के लिए काम करता है? और क्या छपरा की जनता इसी तरह कीचड़ और जलजमाव के बीच रहने के लिए अभिशप्त है? यह वक्त है कि ऐसी जवाबदेही-विहीन प्रशासनिक इकाइयों से कड़े सवाल किए जाएं।

यदि आप भी छपरा से हैं और इस दुर्दशा से परेशान हैं तो इस खबर को शेयर करें।

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