अनकहा इतिहास: अंग्रेजों से पहले का डेहरी (भाग-1)

जन आक्रोश मीडिया | विशेष रिपोर्ट

जब भी डेहरी ऑन सोन के इतिहास की बात होती है, तो चर्चा अक्सर ‘सोन एनीकट’, अंग्रेज़ों के काल, ‘नेहरू सेतु’ या आज़ादी के बाद के ‘डालमियानगर’ के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाती है। जन आक्रोश मीडिया की इस विशेष ऐतिहासिक श्रृंखला में हम उन पन्नों को पलटेंगे जो इस शहर की नींव से जुड़े हैं।

क्या डेहरी का वजूद सिर्फ अंग्रेज़ों या औद्योगिक क्रांति की देन है? दस्तावेज़ी साक्ष्य बताते हैं कि ईंट-गारे के शहर के रूप में बसने से सदियों पहले, भारत के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक और सामरिक रास्तों का मुख्य ‘प्रवेश द्वार’ यही भौगोलिक स्थान था। आइए, दस्तावेज़ों के आईने में डेहरी के इस प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास को समझते हैं।

1. ‘नाम’ बनाम ‘भूगोल’: एक ऐतिहासिक स्पष्टीकरण

इतिहास के पुराने दस्तावेज़ों को खंगालते समय एक बात बिल्कुल स्पष्ट रूप से सामने आती है—16वीं या 18वीं सदी के शुरुआती लिखित दस्तावेज़ों में ‘डेहरी’ (Dehri) शब्द सीधे तौर पर भले ही न मिले, लेकिन इसकी भौगोलिक अवस्थिति (Geographical Location) हर बड़े दस्तावेज़ और नक्शे में मौजूद है।

लिखित और आधिकारिक तौर पर ‘डेहरी’ नाम का सबसे पुख्ता दस्तावेज़ीकरण ब्रिटिश काल के ‘शाहाबाद डिस्ट्रिक्ट गजेटियर (1906)’ में मिलता है। लेकिन उस मुकाम तक पहुँचने से पहले, यह जगह एक घाट, एक पड़ाव और एक सामरिक मुहाने के रूप में पूरे देश को जोड़ती थी।

2. शेरशाह सूरी का काल (16वीं शताब्दी): ‘सड़क-ए-आज़म’ और सोन का मुहाना

डेहरी के वर्तमान भूगोल का सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक संदर्भ अफगान शासक शेरशाह सूरी (1540-1545) के काल में मिलता है।

  • सड़क-ए-आज़म (Grand Trunk Road): शेरशाह सूरी ने बंगाल के सोनारगाँव से लेकर पेशावर तक ‘सड़क-ए-आज़म’ (जिसे आज जीटी रोड कहा जाता है) का निर्माण करवाया था। यह ऐतिहासिक मार्ग सासाराम से होते हुए सीधे सोन नदी के मुहाने पर आकर टिकता था—ठीक उसी जगह, जहाँ आज डेहरी बसा है।
  • तारीख-ए-शेरशाही का साक्ष्य: अब्बास खान सरवानी द्वारा लिखित ‘तारीख-ए-शेरशाही’ में सासाराम, रोहतास और सोन नदी के इस रास्ते से शाही फौजों की आवाजाही का ज़िक्र है। उस दौर में सोन नदी पर कोई पुल नहीं था। यह तट (Ghat) पूरे साम्राज्य के लिए सबसे बड़ा ‘रिवर ट्रांजिट पॉइंट’ (River Transit Point) था, जहाँ से सेनाएं और व्यापारी नावें लेकर नदी पार करते थे।

3. मुगलकालीन दस्तावेज़: ‘आइन-ए-अकबरी’ में रोहतास सरकार

मुगलों के दौर में भी इस इलाके का सामरिक महत्व चरम पर था। अकबर के नवरत्नों में से एक, अबुल फज़ल द्वारा रचित ‘आइन-ए-अकबरी’ में इस पूरे क्षेत्र का राजस्व और प्रशासनिक विवरण मिलता है।

  • आइन-ए-अकबरी के अनुसार, बिहार सूबे को अलग-अलग ‘सरकारों’ में बाँटा गया था, जिनमें ‘रोहतास सरकार’ सबसे प्रमुख थी। जब राजा मान सिंह ने रोहतासगढ़ को अपना मुख्यालय (1587-1594) चुना, तब आगरा से बंगाल जाने वाली तमाम शाही फौजें इसी तराई इलाके और घाट से होकर गुज़रती थीं।

4. 18वीं सदी: जेम्स रेनेल का पहला वैज्ञानिक नक्शा (1779)

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में स्थापित होने के बाद, ‘फादर ऑफ इंडियन जियोग्राफी’ कहे जाने वाले जेम्स रेनेल ने 1779-1781 के बीच भारत का पहला सटीक भौगोलिक नक्शा (A Bengal Atlas) तैयार किया

  • नक्शे का साक्ष्य: यद्यपि रेनेल के इस नक्शे में सासाराम (Saseram), रोहतास (Rotas) और दाउदनगर (Daoudnagur) जैसे बड़े प्रशासनिक केंद्रों के नाम प्रमुखता से दर्ज हैं, लेकिन सबसे खास है वह बिंदुदार रेखा (Dotted Line)। यह रेखा सासाराम से निकलकर पूर्व की ओर सीधे सोन नदी (Soane R.) के पश्चिमी तट से टकराती है। भौगोलिक और तकनीकी दृष्टि से यह बिंदु ठीक वही जगह है जिसे आज हम ‘डेहरी’ कहते हैं।

निष्कर्ष: डालमियानगर के स्वर्ण काल और अंग्रेज़ों की बनाई नहरों से बहुत पहले, डेहरी की पहचान शेरशाह सूरी की चौड़ी सड़कों और शाही नावों के एक अज्ञात लेकिन सबसे अहम ‘पड़ाव’ की थी। 1779 के नक्शे में जो जगह महज़ एक सड़क और नदी का संगम दिखती थी, वही जगह बाद में ‘सोन एनीकट’ और रेलवे के आगमन के साथ एक प्रमुख शहर (1901 में 4,296 की आबादी वाले) के रूप में विकसित हुई, जिसका स्पष्ट प्रमाण 1906 के शाहाबाद गजेटियर में दर्ज है। यह वह ज़मीन है जिसने भारत के सबसे बड़े सत्ता परिवर्तनों को अपने घाटों से गुज़रते हुए देखा है।

(अगले अंक में पढ़ें: डेहरी के ‘बारह पत्थर’ मोहल्ले का इतिहास)

इस लेख के प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत (Sources):

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