औरंगाबाद जिला योजना कार्यालय का लिखित कबूलनामा- “हमें पोर्टल का एक्सेस ही नहीं मिला”, सांसद निधि की जानकारी दबाने का खेल या सिस्टम का लकवा?
जन आक्रोश मीडिया एक्सक्लूसिव
डेहरी / औरंगाबाद:
बिहार सरकार एक तरफ ‘सुशासन’ और ‘डिजिटल बिहार’ का ढिंढोरा पीटते नहीं थकती, वहीं दूसरी तरफ सूचना के अधिकार (RTI) को लेकर पूरी की पूरी प्रशासनिक मशीनरी लकवाग्रस्त हो चुकी है। जिस ‘जानकारी’ (jaankari.bihar.gov.in) पोर्टल को पारदर्शी प्रशासन का प्रतीक बताकर सरकार अपनी पीठ थपथपाती है, उसी पोर्टल के बारे में जिले के जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि उन्हें इसका अता-पता ही नहीं है।
2007 का ‘राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता’ पोर्टल, 2026 में अधिकारियों के लिए अजनबी
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस ‘जानकारी’ पोर्टल को लेकर आज औरंगाबाद के अधिकारी अनभिज्ञता जता रहे हैं, उसी पोर्टल ने भारतीय इंटरनेट क्रांति से दशकों पहले (वर्ष 2007 में) बिहार को राष्ट्रीय स्तर पर ‘बेस्ट ई-गवर्नेंस इनिशिएटिव’ (Best E-Governance Initiative) का पुरस्कार दिलाया था। उस समय पूरे देश में बिहार के इस आरटीआई मॉडल की मिसाल दी गई थी। लेकिन यह कितनी घोर निराशा और प्रशासनिक पतन का विषय है कि लगभग दो दशक बाद, आज के डिजिटल युग में राज्य के अधिकारी इस पुरस्कार विजेता ‘जनहित पोर्टल’ का आईडी-पासवर्ड तक नहीं होने का रोना रो रहे हैं। एक समय जो पोर्टल बिहार के सुशासन का प्रतीक था, आज वह अधिकारियों की लापरवाही और लालफीताशाही के डिजिटल ब्लैक होल में गुम हो चुका है।
हैरानी की बात यह है कि 134 से अधिक दिनों तक आरटीआई आवेदनों को दबाकर रखने के बाद, औरंगाबाद का जिला योजना कार्यालय (DPO) बकायदा लिखित जवाब जारी कर यह स्वीकार कर रहा है कि उनके पास इस सरकारी पोर्टल का कोई लॉग-इन आईडी या पासवर्ड ही नहीं है!
क्या है पूरा मामला?
18वीं काराकाट लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत औरंगाबाद जिले में सांसद निधि (MPLADS) से स्वीकृत सार्वजनिक निर्माण कार्यों (गटर/ड्रेनेज निर्माण एवं फिक्स्ड गार्डन जिम) को लेकर 29 मार्च 2026 को ‘जानकारी’ पोर्टल पर एक आरटीआई (आवेदन संख्या: BR260224000107) दायर की गई थी।
जब महीनों तक इस पर कोई जवाब नहीं मिला और प्रथम अपील भी लंबित रही, तो मुख्यमंत्री के ‘सहयोग पोर्टल’ पर इसकी शिकायत दर्ज कराई गई। इस शिकायत (पंजीकरण सं० REF 705496) के जवाब में 20 अगस्त 2026 को जिला योजना पदाधिकारी, औरंगाबाद ने जो लिखित जवाब (ज्ञापांक 1271) दिया, वह बिहार के पूरे ई-गवर्नेंस मॉडल पर एक करारा तमाचा है।
यह भी पढ़ें: सरकारी चक्कर! घर बैठे ‘डिजिटल ब्रह्मास्त्र’ उपयोग कीजिये
DPO का शर्मनाक जवाब: “हमें पासवर्ड नहीं मिला”
जिला योजना कार्यालय ने अपने आधिकारिक जवाब में लिखा है: “जिला योजना कार्यालय, औरंगाबाद के पास उक्त पोर्टल का कोई भी ऐक्सेस यथा-लॉग इन आई०डी० एवं पासवर्ड संबंधित विभाग द्वारा उपलब्ध नहीं कराया गया है…”

सवाल यह उठता है कि:
- अगर जिले के नोडल योजना कार्यालय के पास ही पोर्टल का एक्सेस नहीं है, तो आम जनता द्वारा ऑनलाइन मांगे गए आरटीआई आवेदनों का क्या हो रहा है?
- क्या ‘जानकारी’ पोर्टल सिर्फ कागजों पर और विज्ञापनों में चमकने के लिए जिंदा रखा गया है?
- माननीय उच्चतम न्यायालय ने 2023 में ही सभी राज्यों को ऑनलाइन आरटीआई पोर्टल अनिवार्य रूप से चालू करने का सख्त निर्देश दिया था। क्या औरंगाबाद जिला प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को भी ठेंगे पर रखता है?
यह सिर्फ एक फाइल का मामला नहीं, पूरे सिस्टम का फेल्योर है
यह स्थिति केवल औरंगाबाद के एक विभाग की नहीं है। विश्वस्त सूत्रों और प्राप्त डेटा के अनुसार, यह हाल लगभग सभी विभागों का है। नागरिक घर बैठे आरटीआई लगाते हैं, पोर्टल पर ‘एप्लीकेशन फॉरवर्डेड’ का स्टेटस दिखता है, और उसके बाद फाइलें डिजिटल ब्लैक होल में गायब हो जाती हैं। महीनों तक कोई अधिकारी उसे खोलकर भी नहीं देखता क्योंकि कथित तौर पर उनके पास ‘पासवर्ड’ ही नहीं है।
क्या छिपाना चाहता है प्रशासन?
सांसद निधि के कार्यों में गुणवत्ता की कमी और लेटलतीफी किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में जब एक पत्रकार और आम नागरिक विकास कार्यों (गटर/ड्रेनेज और जिम) का हिसाब मांगता है, तो आईडी-पासवर्ड न होने का बहाना बनाकर सूचनाओं को दबाना भ्रष्टाचार की ओर सीधा इशारा करता है।
अगर जिलाधिकारी (DM), औरंगाबाद और राज्य सूचना आयोग इस गंभीर प्रशासनिक लापरवाही पर स्वतः संज्ञान लेकर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं करते हैं, तो यह मान लेना चाहिए कि ‘पारदर्शिता’ केवल फाइलों में दफन एक खोखला शब्द बनकर रह गई है।
#BiharNews, #Aurangabad, #RTIBihar, #JaankariPortal, #DigitalBihar, #RightToInformation, #EGovernanceFail, #MPLADS, #JanAakroshMedia, #BiharPolitics, #SystemFail, #RTIAct, #NitishKumar, #GoodGovernance