नई दिल्ली | श्रीनगर | डेहरी ऑन सोन | जन आक्रोश मीडिया
जब बात राजधानी की सड़कों पर सत्ता का रुतबा कायम रखने या संसद की सुरक्षा की आती है, तो हमारा सिस्टम रातों-रात हवाई जहाजों की कतारें लगा देता है। महज कुछ घंटों के आदेश पर हजारों जवानों को एक राज्य से दूसरे राज्य में एयरलिफ्ट कर लिया जाता है। लेकिन, जब बात देश के सबसे संवेदनशील और आतंकवाद प्रभावित इलाके में देश की रक्षा करने वाले जवानों की होती है, तो यही सिस्टम फाइलों और नियमों का हवाला देकर पंगु बन जाता है। अगर जो तत्परता आज दिल्ली में दिखाई गई है, वही 14 फरवरी 2019 से पहले कश्मीर में दिखाई गई होती… तो आज हमारे 40 जवान जिंदा होते!

खतरा किससे? नागरिकों से या आतंकियों से?
हाल ही में दिल्ली में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों और संसद के मानसून सत्र की सुरक्षा के मद्देनजर, पश्चिम बंगाल से सीआरपीएफ की 20 कंपनियों (लगभग 2,000 जवानों) को रातों-रात एयरलिफ्ट कर राजधानी लाया गया। लेकिन यहां एक गंभीर सवाल खड़ा होता है कि आखिर संसद को किससे खतरा था? क्या सड़कों पर उतरे इन निहत्थे बच्चों और उनके अभिभावकों से?
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क्या सरकार की नज़र में अपने हक़ की आवाज़ उठा रहे इस देश के आम नागरिक और ये बच्चे, उन आतंकियों से भी बड़े ‘आतंकी’ हो गए हैं? अपनों की आवाज दबाने और उनसे बचने के लिए रातों-रात 2,000 जवान एयरलिफ्ट कर लिए जाते हैं, लेकिन सरहद पार खड़े असली आतंकियों के सामने हमारे जवानों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है।
पुलवामा: प्रशासनिक चूक या राजनीतिक अवसर?
अब जरा 14 फरवरी 2019 के उस मनहूस दिन को याद कीजिए। जम्मू-श्रीनगर हाईवे भारी बर्फबारी के कारण बंद था और सीआरपीएफ लगातार अपने जवानों को एयरलिफ्ट करने की सिफारिश कर रही थी। सबसे बड़ी बात, हमले से ठीक पहले (8 फरवरी को) खुफिया एजेंसियों ने स्पष्ट अलर्ट जारी कर दिया था कि आतंकी IED और वाहनों (VBIED) के जरिये सुरक्षा बलों के काफिले को निशाना बना सकते हैं।
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इतनी स्पष्ट, सटीक और पुख्ता खुफिया जानकारी होने के बावजूद जवानों को हवाई जहाज क्यों नहीं दिए गए? क्या मोदी सरकार द्वारा इस चेतावनी की अनदेखी महज एक व्यवस्था की नाकामी थी, या फिर इस पूरे घटनाक्रम को किसी ‘राजनीतिक मौके’ के रूप में देखा जा रहा था? यह सवाल आज इसलिए और गहरा हो जाता है क्योंकि इतनी स्पष्ट खुफिया जानकारी होने के बावजूद सरकार द्वारा कोई एक्शन न लेना और 2,500 से अधिक जवानों को मौत के मुंह में धकेल देना, किसी गहरी राजनीतिक स्वार्थ की ओर ही इशारा करता है। क्या सत्ता के लिए एक आतंकी हमले को होने दिया गया?
निष्कर्ष
आज दिल्ली में हवाई जहाजों से उतरते जवानों को देखकर हर उस देशभक्त और शहीद परिवार के सीने में हूक उठती होगी, जिसने पुलवामा में अपनों को खोया है। यह भारी-भरकम तैनाती चीख-चीख कर कह रही है कि जब सरकार ठान ले तो कोई भी संसाधन दूर नहीं है। काश! सत्ता के गलियारों को बचाने और नागरिकों की आवाज़ दबाने के लिए जो फुर्ती आज दिखाई जा रही है, वही फुर्ती जवानों की जान बचाने के लिए दिखाई गई होती, तो 14 फरवरी को देश को ‘ब्लैक डे’ नहीं मनाना पड़ता।
अगर आप भी इस विचार से सहमत हैं तो इसे ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों तक पहुंचायें।