सूरत/बिहार: “अब नहीं आऊंगा दोस्त… बता देना उन्हें।” सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर उमड़ी हज़ारों की भीड़ और लाठियों के बीच से आई एक बेबस मज़दूर की यह आवाज़ आज पूरे देश और विशेषकर बिहार की व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर रही है।

दरअसल, मिडिल-ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण पैदा हुए एलपीजी संकट ने गुजरात के सूरत स्थित टेक्सटाइल उद्योग की कमर तोड़ दी है। गैस की भारी कमी के कारण फैक्ट्रियां ठप पड़ रही हैं और रोज़ाना का उत्पादन 6.5 करोड़ मीटर से घटकर 4.5 करोड़ मीटर रह गया है। नतीजतन, शहर के करीब 30 प्रतिशत यानी लगभग 3 लाख मज़दूरों का रोज़गार छिन गया है। रोज़ी-रोटी छिन जाने के कारण ये मज़दूर अब खाली हाथ अपने घरों (मुख्यतः बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश) की ओर लौटने को मजबूर हैं।
हालात इतने बदतर हैं कि उधना-हसनपुर जैसी ट्रेनों में चढ़ने के लिए स्टेशन पर भारी अफ़रातफ़री मच गई, जिसे नियंत्रित करने के लिए पुलिस और RPF को लाठीचार्ज तक करना पड़ा। घर वापसी की इस जद्दोजहद और सिस्टम की मार खाते मज़दूरों का यह दर्द जन सुराज पार्टी ने भी प्रमुखता से उठाया है।
जन सुराज ने सवाल किया है कि जब केंद्र, गुजरात और बिहार—तीनों जगह ‘ट्रिपल इंजन’ की सरकार है, तो इस अमानवीय स्थिति की ज़िम्मेदारी किसकी है? क्या बिहार सिर्फ दूसरे राज्यों के लिए ‘सस्ते मज़दूरों की फैक्ट्री’ बनकर रह गया है? जब कोई संकट आता है, तो इन युवाओं को इस तरह दर-दर की ठोकरें खाने के लिए क्यों छोड़ दिया जाता है?
इसी ज्वलंत मुद्दे, राजनीतिक छल और उस मज़दूर की आंखों में दिखने वाली निराशा को स्वर देती हुई जन आक्रोश रचित यह कविता:
“अब नहीं आऊंगा दोस्त…”
“अब नहीं आऊँगा दोस्त, जाकर उन्हें बता देना,
कह देना कि ज़िंदगी में, ‘बहुत समस्या’ है।”
पर किसे बतानी थी ये बात, कि वो नहीं लौट पाएगा?
मालिक को, सत्ता को, या ख़ुद को समझाएगा?
सूरत—जो पूर्वी यूपी और बिहार का पुराना ठिकाना है,
ये घूमने की जगह नहीं, मज़दूरी का मयखाना है।
पिता का थका शरीर और घर का भारी क़र्ज़ है,
बहन की डोली उठाने का, बाकी अभी भी फ़र्ज़ है।
इन्हीं दायित्वों को लादे, श्रमिक ट्रेन में वो चढ़ता है,
पिता जहाँ से हार कर लौटे, उसी शहर की ओर बढ़ता है।
आज़ादी का ख़्वाब नहीं, बस दहेज़ का इंतज़ाम है,
ज़िंदगी भर की इस दौड़ का, ‘दो रोटी’ ही ईनाम है।
वो बिहारी बड़ा भोला है, ख़ुद को ही दोषी मानता है,
पर वोट के दिन सिर्फ जात, धर्म और नेता को पहचानता है।
वफ़ादारी का सिला देखो, क्या खूब इस बार उसने पाया,
जब फ़ोन ने मां के खाते में, दस हज़ार आने का पैगाम सुनाया।
सोचा उसने—नेताजी की, मुझपर है बड़ी मेहरबानी,
पांच हज़ार दूंगा साहूकार को, कम होगी कुछ परेशानी।
बाकी पैसों से घर में, कुछ दिनों का राशन लाऊंगा,
वोट नेताजी के बेटे को दे, फिर से सूरत जाऊंगा।
सरकार का ये उपकार मुझपर, मेरे सत्कार का प्रतीक है,
ग़रीब की यही नियति है, और यही तकदीर ठीक है।
फिर अचानक दूर देश में, कोई नई जंग छिड़ जाती है,
अमेरिका-ईरान की आग, मेरी ग़रीब जेब तक आती है।
दिहाड़ी है महज़ तीन सौ, पांच सौ की गैस कैसे लाऊं?
सोचा हालात ज़रा सुधरें तो, कुछ दिन बाद ही लौट आऊं।
लेकिन जैसे ही उधना स्टेशन पर, उसके कदम थे पड़े,
पता नहीं था कि लाठियां लिए, वहां कई लोग हैं खड़े।
वो मार खाकर उसे, अपना पुराना ज़ख़्म याद आया,
लॉकडाउन का वो दौर, जब आख़िरी बार यूं ही मार खाया।
तब उसके दिमाग ने, उसे ज़ोर का तमाचा मारा,
बोला— “तू तो रोज़ पिटता है, ओ क़िस्मत के मारे!
ये जो दुर्दशा है तेरी, ये तेरे ही कर्मों के साए हैं,
जिनको तूने चुना, वो AC कमरों में सुस्ताए हैं।
चंद रुपयों में तुझे फुसला, वो खुद लाखों-करोड़ जोड़ रहे,
और तू यहां दर-दर भटककर, अपनी हड्डियां है तोड़ रहे।”
मार खाकर शरीर टूटा, पर ज़मीर अब सचेत था,
सिस्टम के इस छल-कपट को, वो मज़दूर अब देख चुका।
टूटे-फूटे लफ़्ज़ों में, बस एक ही दर्द लबों पर आया—
“अब नहीं आऊंगा यहां दोस्त… मैं बहुत झेल चुका, बहुत है खाया।”
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